Friday, December 7, 2007

लो जी हम भी आ गए

मुझे थोड़ा नजदीक से जानने वाले मित्रों को तनिक भी यह भ्रम नहीं होगा कि मैं कोई लिक्खड़ पत्रकार हूं और विचारों के स्तर पर बहुत बुलंद हूं। विचार तो मेरे मन में भी उठते हैं लेकिन वह ज्यादा विस्तार पा सके इससे पहले ही दिमाग के किसी कोने में दबकर रह जाते हैं। वजह...भाई स्वभाव में गंभीरता नहीं है और लेखनी कमजोर है। इसलिए मैं बोलता कम और सुनता ज्यादा हूं। बोलूं तो शब्दों का टोटा हो जाता है... इसलिए चुपचाप सुन लेने में ही भलाई मानता हूं। दो महीने पहले नई नौकरी ज्वाइन की है और अभी काम का ज्यादा दबाव नहीं है या यूं कहे कि काम ही नहीं है। खाली समय में इंटरनेट पर यूं ही कुछ-कुछ खोजता रहता हूं...इसी क्रम में कुछ मित्रों के ब्लॉग से जा टकराया। देखा काफी कुछ लिखा-पढ़ा है हमारे साथियों ने। दो-चार दिन के अंतराल पर किसी नए मित्र के ब्लॉग का लिंक भी मेल पर आ जाता है। जाहिरा तौर पर ये सभी "पत्रकार" ही हैं और शब्दों से खेलने की बाजीगरी हासिल है इन्हें। क्या जबरदस्त लिखते हैं...छोटी-मोटी बातों को भी इतना विस्तार देते हैं और उसका इतने शानदार तरीके से विश्लेषण करते हैं कि कई मर्तबा अपने मूढ़ मगज के दरवाजे हिल गए। हां इनमें से कुछ मित्र ऐसे भी हैं जो कुछ ज्यादा ही लंबी छलांग मारते हैं। इतना कि मुझे लगता है कि अगर संभव होता तो उनके शब्द गोला बनकर लक्षित निशाने को भेद आते। ऐसा तो नहीं हो पाता है, लेकिन हां फिजूल की एक बहस जरूर छिड़ती है ब्लॉग पर और लगे हाथों दो-चार कमेन्ट्स भी आ जाते हैं... भाई इसी बहाने हमारे अजीज दोस्त कुछ लोगों के बीच चर्चा के विषय तो बन ही जाते हैं। काफी दिनों तक मैं उधेड़बुन में रहा कि क्यूं नहीं अपनी छोटी बुद्धि के मुताबिक कुछ राय व्यक्त करने के लिए उस मित्र को एक कमेन्ट भेज दूं... अपनी औकात में रहकर थोड़ा सलाह-सुझाव भी दे दूं। इसी सोच-विचार के तहत ये निष्कर्ष निकाला कि अच्छा हो कि अपना ही कोई ब्लॉग बना लूं। वैसे भी अभी ऑफिस में खाली ही रहता हूं तो इसी बहाने थोड़ा टाइपिंग का अभ्यास भी हो जाएगा। तो इसी ख्याल के तहत ये ब्लॉग आपके सामने है। ब्लॉग का उद्देश्य क्या है ये तो अभी मैं तय नहीं कर पाया हूं, हां इतना जरूर है कि एकाध महीने इस पर लिखूंगा और धड़ाधड़ लिखूंगा... इन लिखित विचारों का स्तर कैसा होगा इसके लिए सबसे पहले लिखी लाइन को ध्यान में रखें तो उचित होगा...हां एक बात तय है कि नाम के अनुरूप इस ब्लॉग में लिखी गई बातें तल्ख जरूर होंगी, लेकिन शालीनता के दायरे में।

ले-आउट ज्यादा आकर्षक नहीं बन पाया है, क्योंकि इसके कई फीचर अभी मेरी समझ में नहीं आ रहे हैं। धीरे-धीरे इसकी साजसज्जा निखरती जाए इसके लिए प्रयास जारी रहेगा।

7 comments:

Vandana said...

पत्रकारिता से आपका गहरा रिश्ता है और अपनी भावनाओं को खुलकर लोगों के सामने रखने की समझ भी। हां कहीं कहीं भड़ास भी छिपी है अंदर, जिसे उम्मीद करते हैं कि हम जल्दी ही पड़ेगे। आप के ब्लॉग को पढ़कर लगता है कि आप बेहद सुलझे हुए इंसान है। ऐसे ही लिखते रहिए गुड लक
वंदना

Priya Ranjan Jha said...

स्वागत है सुनील बाबू. हिंदी ब्लोंग जगत में अब लड़ाकुओं की संख्यां पदाकुओं से ज्यादा हो गयी है. ऐसे में आपके जैसे लोगों का आना, जिन्हें अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी न हो, यहाँ ठंडी हवा के झोंकों के आने जैसा है.

Unknown said...

चलिए कोई तो ऐसा है जो छदम बुधिजिविता के लबादे से खुद को दूर रखने की हिम्मत दिखा पाया ब्लोग का आगाज़ जिस तरीके से हुआ है उससे लग रहा है की ये ब्लोग कम से कम इन्तेल्लेक्टुअल मस्तेर्बशन का अड्डा नहीं बनेगा...बाकि तो वक़्त ही बताएगा

sur said...

बधाई हो... ये एक नई और अलग दुनिया है मजेदार, रोचक और ज्ञान से भरपूर. यहां आपको रोज नए अनुभव होंगे. अपना सफर शुरू करें.

विनीत उत्पल said...

वाह सुनील बाबु, क्या बात है। ब्लाग की दुनियाँ आपका स्वागत करता है। अब जम के लिखाइ और गर्जायी होगी। आप कहेगे खरी खरी,हम भी लिखेगे सही-सही। तनी हम रे ब्लाग पर भी तो आइये, देखिए बच्चा भी खुराफात करता है।

बात बेबात said...

क्या बात है सुनील। चिट्ठाकारों की जमात में आप भी शामिल हो ही गए। स्वागत है आपका दोस्त। उम्मीद है जैसा गाते हो वैसा लिखोगे भी।

विजय कुमार झा said...

yar main to kabhi likhkhar patrakar samjha hi nahin. ab man gaya. sahin men likhaku ho