Friday, December 28, 2007

हाय रे बुद्धिजीविता!

यह कहानी मेरे मित्र प्रभात गौड़ ने भेजी है, उसे मूल रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। प्रभात संप्रति नवभारत टाइम्स में सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं।

मोनू राम मेरा छोटा भाई है, सच कहूं तो भाई कम दोस्त ज्यादा। जाहिर है, तमाम मुद्दों पर उसके साथ तर्क वितर्क भी होता रहता है, लेकिन उस दिन बहस का मूड नहीं था, न मेरा, न उसका, पर पता नहीं कैसे बात बढ़ती गई और कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। मुद्दा था पत्रकारों की बुद्धिजीविता।

‘भइया ये बुद्धिजीवी लोग कौन होते हैं?’ मोनू राम चाय की चुस्की लेते हुए बोला। मैंने थोड़े गर्व के साथ उसे बताया, ‘अरे बुद्धिजीवी नहीं समझते तुम! ये विचारक किस्म के लोग होते हैं। यह समाज का वह वर्ग है, जो देश और समाज के बारे में सोचता है। ये मानसिक रूप से बेहद मच्योर होते हैं। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय मुद्दे पर इनसे बात कर लो, तुम्हारे जैसों की तो बखिया उधेड़कर रख देंगे। तुम जैसे आम लोग जहां छोटी-छोटी और दकियानूसी बातों में उलझे रहते हैं, वहीं ये तबका देश और समाज के बारे में सोचता है। समाज को बेहतरी की ओर ले जाना इनका लक्ष्य होता है और सामाजिक कुरीतियां तो इन्हें छू भी नहीं पातीं।’

मोनू राम की आंखों में हैरानी थी। उसने पूछा, ‘ओह...फिर तो ये लोग आम आदमी से कुछ हटकर हुए? एक तरह से समाज और देश के लीडर, पथ प्रदर्शक? ‘और क्या!’ मेरी आवाज में थोड़ा और दंभ आ गया।मोनू राम की जिज्ञासा बढ़ी। उसका अगला सवाल था, ‘तो क्या पत्रकारों को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है?’‘तू बेवकूफ ही रहेगा। अरे, पत्रकार ही तो सबसे बड़े बुद्धिजीवी होते हैं। उनके पास विजन होता है। हर सूचना को अपने पाठकों तक पहुंचाकर वे समाज के प्रति कितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदार निभाते हैं, पता है तुझे? किसी और प्रफेशन के लोग ऐसा करके दिखाएं तो जरा!’ मैंने चैलेंज देते हुए कहा।

मोनू
राम बड़े ही सहज भाव से बोला, ‘पर भइया मेरा एक दोस्त एक अखबार के फीचर्स विभाग में रिपोर्टर है। जब वह कहीं असाइनमेंट पर जाता है, तो वह आयोजकों से गाड़ी मंगा लेता है, पूरे दिन के लिए। इवेंट कवर करके गाड़ी को पूरे दिन अपने पर्सनल काम के लिए प्रयोग करता है। इवेंट से बगैर खाए लौट आने में उसे बेइज्जती महसूस होती है और हां क्या मजाल कि कोई आयोजक उसका गिफ्ट गड़प कर जाए। इससे भी मजे की बात तो ये है कि इवेंट वह प्रेस रिलीज देखकर लिखता है।’मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया, फिर भी अपने भावों को दबाते हुए मैं बोला, ‘वो... वो... अरे तुझे कुछ पता नहीं है। वो तो ऐसे ही... और फिर सब थोड़े ही न करते हैं ऐसे। वो तो किसी ‘धमाका दर्पण’ टाइप किसी सड़क छाप अखबार का कोई छुटभैया पत्रकार होगा।’

मोनू राम अब तर्क करने पर उतारू हो चुका था। बोला, ‘पर भइया बड़े पत्रकार तो और भी बड़े गुल खिलाते हैं। अभी पिछले दिनों सुनने में आया था कि देश के एक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार को सिर्फ इसलिए नौकरी से हाथ धोना पड़ गया कि वह अपनी बेटी की उम्र की लड़की का सेक्सुअल हैरासमेंट कर रहा था। सुना है कि उस चैनल के लोगों ने उसके जाने के बाद राहत की सांस ली है, क्योकिं उसके तानाशाही रवैये से हर कोई परेशान था। मैंने सुना है कि एक चैनल का एक वरिष्ठ पत्रकार और स्क्रीन पर बिकने वाला चेहरा अक्सर दारू के नशे में रहता है और जहां-तहां लड़ाई-झगड़ा करके अपनी शेखी बघारना उसकी आदत में शुमार है। इसी तरह पिछले दिनों एक छोटे से चैनल की एक रिपोर्टर ने अपने सुसाइड नोट में इस चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। जेएनयू के एक जाने-माने वृद्ध बुद्धिजीवी अपनी पत्नी को छोड़कर अपनी एक शिष्या के साथ रहते हैं। और तो और एक मोहतरमा तो अपने हुस्न के दम पर राज्य सभा पहुंचने के ख्वाब देख रही हैं। क्या ये सब बुद्धिजीविता की निशानी है?’ मोनू राम के इन तर्कों की मैं कोई काट नहीं ढूंढ पाया।

झेंप मिटाने के लिए मैंने बात बदली, ‘तू पत्रकार नहीं है न, विजन नहीं है तेरे पास। इसलिए बुद्धिजीविता के चक्कर में न पड़। तू नहीं समझ पाएगा इसे। और फिर ऐसा तो कोई और भी कर सकता है, उन पत्रकारों ने कर दिया तो क्या हुआ?’‘ठीक है, कर सकता है, लेकिन फिर उसे दूसरों की कमियां निकालने और आलोचना करने का क्या अधिकार है? मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं, जो अगर अन्य लोगों, व्यवस्था और नए डेवलपमेंट की खामियां न निकालें, तो उनकी रोटी हजम नहीं होती। ये तो वही बात हुई कि मेरे बच्चे बच्चे, तुम्हारे जनसंख्या, मैं करूं तो प्यार, तुम करो तो चक्कर। ये तो डबल स्टैंडर्ड हुआ।’ मोनू राम के स्वर अब ज्यादा तल्ख हो चुके थे। ‘ये तो देख लिया, ये नहीं देखता कि कितने नॉलेजिएबल लोग होते हैं ये।’ मैंने पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की एक और खूबी को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग किया।

‘अरे काहे की नॉलेज। क्राइम कवर करने वाली एक चैनल की पत्रकार को यह नहीं पता कि डीसीपी बड़ा होता है कि एसीपी। एक अखबार में इंटरव्यू देने आए एक बडिंग जर्नलिस्ट ने एक सवाल के जवाब में कहा कि क्वात्रोकी एक जहाज का नाम है। एक और मोहतरमा ने तो हद ही कर दी। एक बार एक फंक्शन में शिवराज पाटिल आए थे। वह उनके पास गई और बोली कि आपका अगला अलबम कौन सा आ रहा है। उसे लगा कि वह गुलजार हैं। ऐसे ही एक बार संसद के परिसर में खड़े होकर एक पत्रकार ने इंद्रजीत गुप्ता से ही पूछ लिया कि सर प्लीज बता दीजिए कि क्या आप ही भारत के गृह मंत्री हैं। इंद्रजीत ने उसे झिड़का कि अगर आप भारत के गृह मंत्री को नहीं जानतीं, तो आपको इस परिसर में खड़े होने का कोई अधिकार नहीं है। आप पता कर लो चैनलों और अखबारों में ऐसे तमाम पत्रकार हैं, जिन्हें लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा, विधान परिषद जैसे शब्दों के कंसेप्ट पूरी तरह क्लियर नहीं हैं। मुझे तो नहीं लगता कि इस तरह के पत्रकारों में कोई ऐसी खास नॉलेज होती है।’
मोनू राम आर-पार की लड़ाई के मूड में था।‘अच्छा, फिर अखबार में इतने बड़े-बड़े लेख वैसे ही आ जाते हैं?’ मैंने एक बचकाना तर्क दिया।‘अरे यार, नेट किसलिए है? वैसे भी जो ये लोग लिखते हैं, उससे फायदा किसका होता है। क्या ये समाज की स्थिति को बदल पाते हैं। आपको नहीं लगता कि चैनलों पर होने वाली बहस का उद्देश्य देश की स्थिति को बेहतर करना कम और टीआरपी बढ़ाना ज्यादा होता है? फिर सवाल यह भी है कि जितने बड़े-बड़े शब्द और जुमले ये बोलते हैं या लिखते हैं, क्या अपनी निजी जिंदगी में उनका दस प्रतिशत भी उतार पाते हैं। अगर वे खुद नहीं सुधर सकते, तो दूसरों को सुधारने का हक उन्हें किसने दिया? खराब लोग अन्य क्षेत्रों में भी हैं, लेकिन वे कम से कम दूसरों की आलोचना तो नहीं करते।’

मोनू राम के तर्कों के सामने मैं चारों खाने चित हो चुका था। फिर भी पत्रकार हूं, इतनी जल्दी हार तो नहीं मानूंगा। मैंने अगला तीर छोड़ा, ‘अब तू कुछ भी बोल, पर सचाई यही है कि पत्रकार की समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है।’‘और उसकी अकाउंटेबिलिटी किसके प्रति होती है?’ पहली बार मोनू राम को इतना उग्र देखा था। ‘अपने रीडर्स और ऑडिएंस के प्रति?’ मैंने तुरंत कहा।‘नाग नागिन का खेल दिखाकर, है ना?’ मोनू राम ने लगभग चिढ़ाते हुए मुझसे कहा। खुद को काबिल दिखाते हुए मैंने उसे समझाया, ‘अरे वो टीआरपी का चक्कर है भई, तू नहीं समझेगा? टीआरपी बढ़ेगी, तब ही तो चैनल चलेगा। फायदा नहीं कमाएंगे क्या?’ ‘अरे बिल्कुल कमाओ फायदा, पर फिर समाज, देश, क्या हुआ, क्या होना चाहिए, क्या सही, क्या गलत ऐसे जुमलों का प्रयोग क्यों करते हो।’ मोनू राम के पास मेरे हर तर्क की काट थी।

1 comment:

Unknown said...

Aapki ye kahani 'budhijeevita' shabd ki achhi tarah se vyakhya karti hai. Hay re budhijeevita aur hamare budhijeevi. Ham jaise tuchh logon ki to koi aukaat hi nahin hai. Par bade-bade akhbaaron mein baithe waise bade log jinke rahte Home page par bhi mistakes jaati hain, unko is story ka link jaroor bhej dijiye.