ईश्वर प्रदत सबसे सुंदर अनुभूति का नाम है प्यार। देखा जाए तो पूरी कायनात की बुनियाद प्रेम संबंधों पर ही टिकी है। अगर आदम और हव्वा के दिल में प्यार की टीस नहीं उठती तो शायद यह सृष्टि ही नहीं होती। तभी तो किसी कवि ने कहा है : -
"हर घर-आंगन रंगमंच हैऔर हर एक सांस कठपुतली।प्यार सिर्फ वह डोर कि जिस पर नाचे बादल, नाचे
तुम चाहे विश्वास न लाओ, लेकिन मैं तो यही कहूंगाप्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।"
प्यार के बारे में कहते हैं कि यह एक अबूझी और अनूठी अनुभूति है जिसकी प्यास कभी न बुझती है, जिसकी रोशनी कभी धीमी नहीं पड़ती है। और अगर कबीर के शब्दों में कहें तो
प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा- प्रजा जेहि रुचै, शीश देय ले जाए।
प्यार को समझने-समझाने में न जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं, लेकिन फिर भी इश्क में डूबने-इतराने वाले आशिकों के लिए इस पहेली को भुना पाना आसान नहीं हुआ है। "दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजै, आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजै।"
रिश्तों की जमीन पर खिलने वाले हर फूल की खुशबू का नाम है प्यार। कबीर ने प्रेम की जो अलौकिक व्याख्या की है, वो इस तरह है-
प्रेमी ढूंढत मैं फिरौं, प्रेमी मिला न कोय।प्रेमी को प्रेमी मिला, सब विष अमृत होय।।
वहीं रसनिधि कहते हैं-अद्भुत गत यह प्रेम की, बैनन कही न जाइ।दरस भूख लागै दृगन, भूखहि देत भगाइ।।
आज का दिन दुनिया भर में प्रेम के उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। भारत में वैलेंटाइन डे मनाने का प्रचलन बहुत पुराना नहीं है, वैश्वीकरण की धारा में बाजार ने इस उत्सव को यहां के युवाओं में लोकप्रिय बनाया है। मगर प्रेम की गंगा यहां युगों-युगों से बह रही हैं। विश्व को दया, करुणा और शांति का पाठ पढ़ाने में भारत का अग्रणी स्थान है। प्रेम इन सभी गुणों के मूल में अंतर्निहित है। जो भी साधु-संत और समाजसुधारक हुए हैं सभी ने प्रेम का संदेश ही दिया
एक बात और गौर करने लायक है कि प्रेम का एक दिन ही क्यों हो... इसे तो जीवनशैली में बनाने की जरूरत है। प्यार के इजहार के लिए हम सिर्फ प्रेमिका के पास ही क्यों जाएं, हर नातेदार-रिश्तेदार, बूढ़े-जवान सबको प्रेम से गले लगाएं। प्रेम महज भावुकता नहीं, जीवनशैली है। हम भले ही अपने को आधुनिक मान रहे हों लेकिन इस अर्थ युग में समाज में प्रेम का अकाल पड़ा हुआ है।
अगर जीवन में प्रेम का नियमित संचार होने लगे तो इंसान के अंदर मौजूद सभी कमियां खत्म हो जाएंगी। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-धर्म की सारी दीवारें भरभरा कर गिर सकती हैं। लोग जीना सीख जाएंगे। हां मगर यह तभी होगा जब हम सिर्फ दिखावे के लिए प्रेमोत्सव के रंग में न रंगे, बल्कि डूबे उस नशा में जिसके प्याला में अगर जहर भी मिला दिया जाए तो वह अमृत बन जाता है।
Thursday, February 14, 2008
Friday, December 28, 2007
हाय रे बुद्धिजीविता!
यह कहानी मेरे मित्र प्रभात गौड़ ने भेजी है, उसे मूल रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। प्रभात संप्रति नवभारत टाइम्स में सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं।
मोनू राम मेरा छोटा भाई है, सच कहूं तो भाई कम दोस्त ज्यादा। जाहिर है, तमाम मुद्दों पर उसके साथ तर्क वितर्क भी होता रहता है, लेकिन उस दिन बहस का मूड नहीं था, न मेरा, न उसका, पर पता नहीं कैसे बात बढ़ती गई और कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। मुद्दा था पत्रकारों की बुद्धिजीविता।
‘भइया ये बुद्धिजीवी लोग कौन होते हैं?’ मोनू राम चाय की चुस्की लेते हुए बोला। मैंने थोड़े गर्व के साथ उसे बताया, ‘अरे बुद्धिजीवी नहीं समझते तुम! ये विचारक किस्म के लोग होते हैं। यह समाज का वह वर्ग है, जो देश और समाज के बारे में सोचता है। ये मानसिक रूप से बेहद मच्योर होते हैं। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय मुद्दे पर इनसे बात कर लो, तुम्हारे जैसों की तो बखिया उधेड़कर रख देंगे। तुम जैसे आम लोग जहां छोटी-छोटी और दकियानूसी बातों में उलझे रहते हैं, वहीं ये तबका देश और समाज के बारे में सोचता है। समाज को बेहतरी की ओर ले जाना इनका लक्ष्य होता है और सामाजिक कुरीतियां तो इन्हें छू भी नहीं पातीं।’
मोनू राम की आंखों में हैरानी थी। उसने पूछा, ‘ओह...फिर तो ये लोग आम आदमी से कुछ हटकर हुए? एक तरह से समाज और देश के लीडर, पथ प्रदर्शक? ‘और क्या!’ मेरी आवाज में थोड़ा और दंभ आ गया।मोनू राम की जिज्ञासा बढ़ी। उसका अगला सवाल था, ‘तो क्या पत्रकारों को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है?’‘तू बेवकूफ ही रहेगा। अरे, पत्रकार ही तो सबसे बड़े बुद्धिजीवी होते हैं। उनके पास विजन होता है। हर सूचना को अपने पाठकों तक पहुंचाकर वे समाज के प्रति कितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदार निभाते हैं, पता है तुझे? किसी और प्रफेशन के लोग ऐसा करके दिखाएं तो जरा!’ मैंने चैलेंज देते हुए कहा।
मोनू राम बड़े ही सहज भाव से बोला, ‘पर भइया मेरा एक दोस्त एक अखबार के फीचर्स विभाग में रिपोर्टर है। जब वह कहीं असाइनमेंट पर जाता है, तो वह आयोजकों से गाड़ी मंगा लेता है, पूरे दिन के लिए। इवेंट कवर करके गाड़ी को पूरे दिन अपने पर्सनल काम के लिए प्रयोग करता है। इवेंट से बगैर खाए लौट आने में उसे बेइज्जती महसूस होती है और हां क्या मजाल कि कोई आयोजक उसका गिफ्ट गड़प कर जाए। इससे भी मजे की बात तो ये है कि इवेंट वह प्रेस रिलीज देखकर लिखता है।’मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया, फिर भी अपने भावों को दबाते हुए मैं बोला, ‘वो... वो... अरे तुझे कुछ पता नहीं है। वो तो ऐसे ही... और फिर सब थोड़े ही न करते हैं ऐसे। वो तो किसी ‘धमाका दर्पण’ टाइप किसी सड़क छाप अखबार का कोई छुटभैया पत्रकार होगा।’
मोनू राम अब तर्क करने पर उतारू हो चुका था। बोला, ‘पर भइया बड़े पत्रकार तो और भी बड़े गुल खिलाते हैं। अभी पिछले दिनों सुनने में आया था कि देश के एक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार को सिर्फ इसलिए नौकरी से हाथ धोना पड़ गया कि वह अपनी बेटी की उम्र की लड़की का सेक्सुअल हैरासमेंट कर रहा था। सुना है कि उस चैनल के लोगों ने उसके जाने के बाद राहत की सांस ली है, क्योकिं उसके तानाशाही रवैये से हर कोई परेशान था। मैंने सुना है कि एक चैनल का एक वरिष्ठ पत्रकार और स्क्रीन पर बिकने वाला चेहरा अक्सर दारू के नशे में रहता है और जहां-तहां लड़ाई-झगड़ा करके अपनी शेखी बघारना उसकी आदत में शुमार है। इसी तरह पिछले दिनों एक छोटे से चैनल की एक रिपोर्टर ने अपने सुसाइड नोट में इस चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। जेएनयू के एक जाने-माने वृद्ध बुद्धिजीवी अपनी पत्नी को छोड़कर अपनी एक शिष्या के साथ रहते हैं। और तो और एक मोहतरमा तो अपने हुस्न के दम पर राज्य सभा पहुंचने के ख्वाब देख रही हैं। क्या ये सब बुद्धिजीविता की निशानी है?’ मोनू राम के इन तर्कों की मैं कोई काट नहीं ढूंढ पाया।
झेंप मिटाने के लिए मैंने बात बदली, ‘तू पत्रकार नहीं है न, विजन नहीं है तेरे पास। इसलिए बुद्धिजीविता के चक्कर में न पड़। तू नहीं समझ पाएगा इसे। और फिर ऐसा तो कोई और भी कर सकता है, उन पत्रकारों ने कर दिया तो क्या हुआ?’‘ठीक है, कर सकता है, लेकिन फिर उसे दूसरों की कमियां निकालने और आलोचना करने का क्या अधिकार है? मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं, जो अगर अन्य लोगों, व्यवस्था और नए डेवलपमेंट की खामियां न निकालें, तो उनकी रोटी हजम नहीं होती। ये तो वही बात हुई कि मेरे बच्चे बच्चे, तुम्हारे जनसंख्या, मैं करूं तो प्यार, तुम करो तो चक्कर। ये तो डबल स्टैंडर्ड हुआ।’ मोनू राम के स्वर अब ज्यादा तल्ख हो चुके थे। ‘ये तो देख लिया, ये नहीं देखता कि कितने नॉलेजिएबल लोग होते हैं ये।’ मैंने पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की एक और खूबी को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग किया।
‘अरे काहे की नॉलेज। क्राइम कवर करने वाली एक चैनल की पत्रकार को यह नहीं पता कि डीसीपी बड़ा होता है कि एसीपी। एक अखबार में इंटरव्यू देने आए एक बडिंग जर्नलिस्ट ने एक सवाल के जवाब में कहा कि क्वात्रोकी एक जहाज का नाम है। एक और मोहतरमा ने तो हद ही कर दी। एक बार एक फंक्शन में शिवराज पाटिल आए थे। वह उनके पास गई और बोली कि आपका अगला अलबम कौन सा आ रहा है। उसे लगा कि वह गुलजार हैं। ऐसे ही एक बार संसद के परिसर में खड़े होकर एक पत्रकार ने इंद्रजीत गुप्ता से ही पूछ लिया कि सर प्लीज बता दीजिए कि क्या आप ही भारत के गृह मंत्री हैं। इंद्रजीत ने उसे झिड़का कि अगर आप भारत के गृह मंत्री को नहीं जानतीं, तो आपको इस परिसर में खड़े होने का कोई अधिकार नहीं है। आप पता कर लो चैनलों और अखबारों में ऐसे तमाम पत्रकार हैं, जिन्हें लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा, विधान परिषद जैसे शब्दों के कंसेप्ट पूरी तरह क्लियर नहीं हैं। मुझे तो नहीं लगता कि इस तरह के पत्रकारों में कोई ऐसी खास नॉलेज होती है।’
मोनू राम आर-पार की लड़ाई के मूड में था।‘अच्छा, फिर अखबार में इतने बड़े-बड़े लेख वैसे ही आ जाते हैं?’ मैंने एक बचकाना तर्क दिया।‘अरे यार, नेट किसलिए है? वैसे भी जो ये लोग लिखते हैं, उससे फायदा किसका होता है। क्या ये समाज की स्थिति को बदल पाते हैं। आपको नहीं लगता कि चैनलों पर होने वाली बहस का उद्देश्य देश की स्थिति को बेहतर करना कम और टीआरपी बढ़ाना ज्यादा होता है? फिर सवाल यह भी है कि जितने बड़े-बड़े शब्द और जुमले ये बोलते हैं या लिखते हैं, क्या अपनी निजी जिंदगी में उनका दस प्रतिशत भी उतार पाते हैं। अगर वे खुद नहीं सुधर सकते, तो दूसरों को सुधारने का हक उन्हें किसने दिया? खराब लोग अन्य क्षेत्रों में भी हैं, लेकिन वे कम से कम दूसरों की आलोचना तो नहीं करते।’
मोनू राम के तर्कों के सामने मैं चारों खाने चित हो चुका था। फिर भी पत्रकार हूं, इतनी जल्दी हार तो नहीं मानूंगा। मैंने अगला तीर छोड़ा, ‘अब तू कुछ भी बोल, पर सचाई यही है कि पत्रकार की समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है।’‘और उसकी अकाउंटेबिलिटी किसके प्रति होती है?’ पहली बार मोनू राम को इतना उग्र देखा था। ‘अपने रीडर्स और ऑडिएंस के प्रति?’ मैंने तुरंत कहा।‘नाग नागिन का खेल दिखाकर, है ना?’ मोनू राम ने लगभग चिढ़ाते हुए मुझसे कहा। खुद को काबिल दिखाते हुए मैंने उसे समझाया, ‘अरे वो टीआरपी का चक्कर है भई, तू नहीं समझेगा? टीआरपी बढ़ेगी, तब ही तो चैनल चलेगा। फायदा नहीं कमाएंगे क्या?’ ‘अरे बिल्कुल कमाओ फायदा, पर फिर समाज, देश, क्या हुआ, क्या होना चाहिए, क्या सही, क्या गलत ऐसे जुमलों का प्रयोग क्यों करते हो।’ मोनू राम के पास मेरे हर तर्क की काट थी।
मोनू राम मेरा छोटा भाई है, सच कहूं तो भाई कम दोस्त ज्यादा। जाहिर है, तमाम मुद्दों पर उसके साथ तर्क वितर्क भी होता रहता है, लेकिन उस दिन बहस का मूड नहीं था, न मेरा, न उसका, पर पता नहीं कैसे बात बढ़ती गई और कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। मुद्दा था पत्रकारों की बुद्धिजीविता।
‘भइया ये बुद्धिजीवी लोग कौन होते हैं?’ मोनू राम चाय की चुस्की लेते हुए बोला। मैंने थोड़े गर्व के साथ उसे बताया, ‘अरे बुद्धिजीवी नहीं समझते तुम! ये विचारक किस्म के लोग होते हैं। यह समाज का वह वर्ग है, जो देश और समाज के बारे में सोचता है। ये मानसिक रूप से बेहद मच्योर होते हैं। किसी भी सामाजिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय मुद्दे पर इनसे बात कर लो, तुम्हारे जैसों की तो बखिया उधेड़कर रख देंगे। तुम जैसे आम लोग जहां छोटी-छोटी और दकियानूसी बातों में उलझे रहते हैं, वहीं ये तबका देश और समाज के बारे में सोचता है। समाज को बेहतरी की ओर ले जाना इनका लक्ष्य होता है और सामाजिक कुरीतियां तो इन्हें छू भी नहीं पातीं।’
मोनू राम की आंखों में हैरानी थी। उसने पूछा, ‘ओह...फिर तो ये लोग आम आदमी से कुछ हटकर हुए? एक तरह से समाज और देश के लीडर, पथ प्रदर्शक? ‘और क्या!’ मेरी आवाज में थोड़ा और दंभ आ गया।मोनू राम की जिज्ञासा बढ़ी। उसका अगला सवाल था, ‘तो क्या पत्रकारों को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है?’‘तू बेवकूफ ही रहेगा। अरे, पत्रकार ही तो सबसे बड़े बुद्धिजीवी होते हैं। उनके पास विजन होता है। हर सूचना को अपने पाठकों तक पहुंचाकर वे समाज के प्रति कितनी महत्वपूर्ण जिम्मेदार निभाते हैं, पता है तुझे? किसी और प्रफेशन के लोग ऐसा करके दिखाएं तो जरा!’ मैंने चैलेंज देते हुए कहा।
मोनू राम बड़े ही सहज भाव से बोला, ‘पर भइया मेरा एक दोस्त एक अखबार के फीचर्स विभाग में रिपोर्टर है। जब वह कहीं असाइनमेंट पर जाता है, तो वह आयोजकों से गाड़ी मंगा लेता है, पूरे दिन के लिए। इवेंट कवर करके गाड़ी को पूरे दिन अपने पर्सनल काम के लिए प्रयोग करता है। इवेंट से बगैर खाए लौट आने में उसे बेइज्जती महसूस होती है और हां क्या मजाल कि कोई आयोजक उसका गिफ्ट गड़प कर जाए। इससे भी मजे की बात तो ये है कि इवेंट वह प्रेस रिलीज देखकर लिखता है।’मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया, फिर भी अपने भावों को दबाते हुए मैं बोला, ‘वो... वो... अरे तुझे कुछ पता नहीं है। वो तो ऐसे ही... और फिर सब थोड़े ही न करते हैं ऐसे। वो तो किसी ‘धमाका दर्पण’ टाइप किसी सड़क छाप अखबार का कोई छुटभैया पत्रकार होगा।’
मोनू राम अब तर्क करने पर उतारू हो चुका था। बोला, ‘पर भइया बड़े पत्रकार तो और भी बड़े गुल खिलाते हैं। अभी पिछले दिनों सुनने में आया था कि देश के एक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार को सिर्फ इसलिए नौकरी से हाथ धोना पड़ गया कि वह अपनी बेटी की उम्र की लड़की का सेक्सुअल हैरासमेंट कर रहा था। सुना है कि उस चैनल के लोगों ने उसके जाने के बाद राहत की सांस ली है, क्योकिं उसके तानाशाही रवैये से हर कोई परेशान था। मैंने सुना है कि एक चैनल का एक वरिष्ठ पत्रकार और स्क्रीन पर बिकने वाला चेहरा अक्सर दारू के नशे में रहता है और जहां-तहां लड़ाई-झगड़ा करके अपनी शेखी बघारना उसकी आदत में शुमार है। इसी तरह पिछले दिनों एक छोटे से चैनल की एक रिपोर्टर ने अपने सुसाइड नोट में इस चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। जेएनयू के एक जाने-माने वृद्ध बुद्धिजीवी अपनी पत्नी को छोड़कर अपनी एक शिष्या के साथ रहते हैं। और तो और एक मोहतरमा तो अपने हुस्न के दम पर राज्य सभा पहुंचने के ख्वाब देख रही हैं। क्या ये सब बुद्धिजीविता की निशानी है?’ मोनू राम के इन तर्कों की मैं कोई काट नहीं ढूंढ पाया।
झेंप मिटाने के लिए मैंने बात बदली, ‘तू पत्रकार नहीं है न, विजन नहीं है तेरे पास। इसलिए बुद्धिजीविता के चक्कर में न पड़। तू नहीं समझ पाएगा इसे। और फिर ऐसा तो कोई और भी कर सकता है, उन पत्रकारों ने कर दिया तो क्या हुआ?’‘ठीक है, कर सकता है, लेकिन फिर उसे दूसरों की कमियां निकालने और आलोचना करने का क्या अधिकार है? मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं, जो अगर अन्य लोगों, व्यवस्था और नए डेवलपमेंट की खामियां न निकालें, तो उनकी रोटी हजम नहीं होती। ये तो वही बात हुई कि मेरे बच्चे बच्चे, तुम्हारे जनसंख्या, मैं करूं तो प्यार, तुम करो तो चक्कर। ये तो डबल स्टैंडर्ड हुआ।’ मोनू राम के स्वर अब ज्यादा तल्ख हो चुके थे। ‘ये तो देख लिया, ये नहीं देखता कि कितने नॉलेजिएबल लोग होते हैं ये।’ मैंने पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की एक और खूबी को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग किया।
‘अरे काहे की नॉलेज। क्राइम कवर करने वाली एक चैनल की पत्रकार को यह नहीं पता कि डीसीपी बड़ा होता है कि एसीपी। एक अखबार में इंटरव्यू देने आए एक बडिंग जर्नलिस्ट ने एक सवाल के जवाब में कहा कि क्वात्रोकी एक जहाज का नाम है। एक और मोहतरमा ने तो हद ही कर दी। एक बार एक फंक्शन में शिवराज पाटिल आए थे। वह उनके पास गई और बोली कि आपका अगला अलबम कौन सा आ रहा है। उसे लगा कि वह गुलजार हैं। ऐसे ही एक बार संसद के परिसर में खड़े होकर एक पत्रकार ने इंद्रजीत गुप्ता से ही पूछ लिया कि सर प्लीज बता दीजिए कि क्या आप ही भारत के गृह मंत्री हैं। इंद्रजीत ने उसे झिड़का कि अगर आप भारत के गृह मंत्री को नहीं जानतीं, तो आपको इस परिसर में खड़े होने का कोई अधिकार नहीं है। आप पता कर लो चैनलों और अखबारों में ऐसे तमाम पत्रकार हैं, जिन्हें लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा, विधान परिषद जैसे शब्दों के कंसेप्ट पूरी तरह क्लियर नहीं हैं। मुझे तो नहीं लगता कि इस तरह के पत्रकारों में कोई ऐसी खास नॉलेज होती है।’
मोनू राम आर-पार की लड़ाई के मूड में था।‘अच्छा, फिर अखबार में इतने बड़े-बड़े लेख वैसे ही आ जाते हैं?’ मैंने एक बचकाना तर्क दिया।‘अरे यार, नेट किसलिए है? वैसे भी जो ये लोग लिखते हैं, उससे फायदा किसका होता है। क्या ये समाज की स्थिति को बदल पाते हैं। आपको नहीं लगता कि चैनलों पर होने वाली बहस का उद्देश्य देश की स्थिति को बेहतर करना कम और टीआरपी बढ़ाना ज्यादा होता है? फिर सवाल यह भी है कि जितने बड़े-बड़े शब्द और जुमले ये बोलते हैं या लिखते हैं, क्या अपनी निजी जिंदगी में उनका दस प्रतिशत भी उतार पाते हैं। अगर वे खुद नहीं सुधर सकते, तो दूसरों को सुधारने का हक उन्हें किसने दिया? खराब लोग अन्य क्षेत्रों में भी हैं, लेकिन वे कम से कम दूसरों की आलोचना तो नहीं करते।’
मोनू राम के तर्कों के सामने मैं चारों खाने चित हो चुका था। फिर भी पत्रकार हूं, इतनी जल्दी हार तो नहीं मानूंगा। मैंने अगला तीर छोड़ा, ‘अब तू कुछ भी बोल, पर सचाई यही है कि पत्रकार की समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है।’‘और उसकी अकाउंटेबिलिटी किसके प्रति होती है?’ पहली बार मोनू राम को इतना उग्र देखा था। ‘अपने रीडर्स और ऑडिएंस के प्रति?’ मैंने तुरंत कहा।‘नाग नागिन का खेल दिखाकर, है ना?’ मोनू राम ने लगभग चिढ़ाते हुए मुझसे कहा। खुद को काबिल दिखाते हुए मैंने उसे समझाया, ‘अरे वो टीआरपी का चक्कर है भई, तू नहीं समझेगा? टीआरपी बढ़ेगी, तब ही तो चैनल चलेगा। फायदा नहीं कमाएंगे क्या?’ ‘अरे बिल्कुल कमाओ फायदा, पर फिर समाज, देश, क्या हुआ, क्या होना चाहिए, क्या सही, क्या गलत ऐसे जुमलों का प्रयोग क्यों करते हो।’ मोनू राम के पास मेरे हर तर्क की काट थी।
Friday, December 21, 2007
गुजरा जमाना बचपन का
जगजीत सिंह की गाई हुई एक गजल है-
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो। भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी।।
हम जब किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे होते हैं, तब तो शायद बचपन उतना नहीं लुभाता, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही बचपन की यादें बड़ी सुहावनी होती जाती है। आप ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, कई तरह की जिम्मेदारियां आपके कंधों पर आती जाती हैं, समय नहीं मिलता पलट कर देखने का। बस काम-काम और सिर्फ काम की धुन सवार होती है। ऑफिस में घर में पचास तरह के काम, कुछ जरूरी तो कुछ औपचारिक काम। कुछ निभाने को तो कुछ दिखाने के काम। इन सबसे जब कभी फुरसत मिले तो फिर फोन-फान, टीवी देखना, थोड़ा घूमना-फिरना, पढ़ना-लिखना, मित्रों से मिलना-जुलना सारा कुछ इन गतिविधियों के इर्द-गिर्द सिमटा रह जाता है। इतना सब कुछ के बाद नींद में सपने देखने की गुंजाइश भी कहां बची रहती है। अलबत्ता जब कभी बिल्कुल निश्चिंत होकर बिस्तर पर अनमना सा लेटा रहता हूं मोबाइल स्विच ऑफ कर तब मैं अक्सर फ्लैशबैक में चला जाता हूं। आज से 15-20 साल पहले के वक्त में। और बीते लम्हों को याद करते हुए जो खुशी मिलती है, उसे पाना अब मेरे वश में नहीं है। अब जितना कुछ मिल जाए, संतुष्टि नहीं मिलती। कुछ और पाने की चाह हमेशा बनी ही रहती है।
बचपन से सहेजी कुछ खट्टी-मीठी यादों को आज पहली बार कलमबद्ध करने जा रहा हूं। बचपन के बारे में जैसा मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है वैसा लिखना हर किसी के वश में तो नहीं, फिर भी लय, भाव और प्रवाह पर ज्यादा ध्यान न देते हुए मैं जीवन के उन अनमोल पलों को शब्दों में पिरोकर आपके सामने रख रहा हूं। पांच-भाई बहनों में मैं चौथे नंबर पर था। बचपन से ही कृशकाय। अव्वल दर्जे का शरारती। दिमाग से बिल्कुल सुन्न। जो जिद ठान ली, वह हर हाल में पूरी होनी चाहिए....नहीं तो जो कपड़े पहने होते थे, उसे तत्काल फट जाना था। डंडा लेकर बिजली के बल्बों को फोड़ देता था। घर में जो सामान करीने से रखे होते थे, दो मिनट के अंदर आंगन में बिखर जाते थे। अच्छा मेरे पापा को गुस्सा कभी नहीं आता, वह हम भाई-बहनों में से किसी को कभी एक थप्पर भी मारे होंगे यह याद नहीं। इतना ही नहीं वो हमें तुम से भी नहीं बुलाते...हमेशा आप ही कहते हैं। सबको मालूम था, इसे शांत करना है तो या तो इसकी जिद पूरी कर दो या फिर आफत झेलने को तैयार हो जाओ। मां कभी झल्लाकर मारने उठती भी तो दादी बचाव में आ जातीं और फिर बहला-फुसलाकर मुझे शांत कर देतीं।
बचपन में डॉक्टर- डॉक्टर खेलना सीखा। इसी दौरान मैंने मां के सामने फरमाइश रख दी कि मुझे असली वाली सूई-सिरींज चाहिए। मां ने मना किया तो रोना-धोना चालू। खाना भी नहीं खाया और एक घर में रखे संदूक के नीचे जाकर बैठ गया। दादी वहां से मुझे गोदी में उठाकर लाई और पिताजी को फरमान सुनाया कि किसी को भेजकर अभी सूई-सिरींज मंगवा दो। खैर साहब, पिताजी ने एक आदमी को साइकिल लेकर तत्काल बाजार भेजा और दो घंटे के अंदर मेरी फरमाइश पूरी हो गई।
असली करामात तो इसके बाद हुआ। मैंने आनन-फानन में सिरींज में पानी भरा, उस पर सूई लगाई और जो सज्जन बाजार से इसे खरीदकर आए थे चुपके से उन्हीं के कूल्हे पर जाकर ठोक दी। मारे दर्द के वो बिलबिला उठे। मैं फौरन दौड़कर दादी के पास पहुंच गया और खुशी-खुशी अपनी बहादुरी का किस्सा सुना आया। दादी बोली कि अब तो खैर नहीं। तेरे पापा तेरे साथ मुझे भी डांटेंगे। इसीलिए तुमने सूई मंगवायी है। चल ला इसे अभी तोड़ देती हूं। खैर उस दिन तो किसी तरह बच गया। लेकिन इसके एवज में जो कुछ मुझे झेलना पड़ा वो दास्तां कुछ इस प्रकार है। दो-चार दिन के बाद सबसे नजर बचाकर मैं दरवाजे पर आराम से लेटी कुतिया को सूई भोंकने पहुंच गया। ज्यों ही मैंने उसे सूई लगाई, काईं-काईं करते हुए पलटकर उसने मेरे बाएं पांव में दांत गड़ा दिए। मैं बाप-बापकर भागा आंगन की ओर। दरवाजे पर मौजूद नौकरों का ध्यान पड़ा। दौड़कर मुझे उठाया घर में कोहराम मच गया। मां-दादी, दीदी सब भागती हुईं आईं। मैं रोए जा रहा था...लेकिन सूई-सिरींज अब भी हाथ में ही थे, उसे मैंने नहीं छोड़ा था। पापा आए मेरे हाथ से सूई-सिरींज लेकर रख लिए और बड़ी आराम से बोले अब तो मन भर गया ना। ....
इसके बाद का एक और वाकया याद आ रहा है। तब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था।पिताजी ने एक शिक्षक को मुझे ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा था। बाकी एक अन्य शिक्षक थे ही, जो खासतौर पर अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ाते थे। शायद जून का महीना होगा। मैं बनियान पहनकर अपने गणित वाले शिक्षक से पढ़ रहा था। भाग का एक सवाल मैं लगातार गलत बना रहा था। तैश में आकर गुरुजी ने पीठ पर एक जोरदार मुक्का जड़ दिया। कुछ पल तो मैं चुप बैठा रहा, फिर चुपके से उठा और आंगन की ओर बढ़ गया। पांच मिनट के अंदर ही एक कमरे में रखी तलवार घसीटते हुए मैं दरवाजे की ओर दौड़ा। संयोग से मेरी मां की नजर पड़ गई। वो थोड़ी दूर में खड़ी थीं। चिल्लाते हुए वह मुझे पकड़ने के लिए दौड़ीं। फिर पापा को आवाज देते हुए बोलीं कि बौआ (मुझे घर में इसी नाम से बुलाया जाता है) तलवार लेकर जा रहा है, इसको पकड़ लीजिए। पापा लपककर मुझे पकड़ लिए बोले क्या हुआ, क्यों तलवार लेकर आ रहे हैं। मैं जोर से रोते हुए चिल्लाते हुए फट पड़ा- इस साले मास्टर की गरदन उतारकर रख दूंगा। मुझे मारता है...। मां पीछे से शिक्षक को आवाज लगाती हुई बोलीं कि वो भाग जाएं। मास्टर साहब ने हड़बड़ाकर साइकिल उठायी और भाग खड़े हुए। इसके बाद मुझे किसी तरह शांत किया गया।
तो ऐसा था मैं बचपन में। ऐसे ही कुछ और वाकये और फिर मैं कैसे एक शांत और समझदार किशोर बना, उसके बारे में आगे लिखूंगा।
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो। भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी।।
हम जब किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे होते हैं, तब तो शायद बचपन उतना नहीं लुभाता, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही बचपन की यादें बड़ी सुहावनी होती जाती है। आप ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, कई तरह की जिम्मेदारियां आपके कंधों पर आती जाती हैं, समय नहीं मिलता पलट कर देखने का। बस काम-काम और सिर्फ काम की धुन सवार होती है। ऑफिस में घर में पचास तरह के काम, कुछ जरूरी तो कुछ औपचारिक काम। कुछ निभाने को तो कुछ दिखाने के काम। इन सबसे जब कभी फुरसत मिले तो फिर फोन-फान, टीवी देखना, थोड़ा घूमना-फिरना, पढ़ना-लिखना, मित्रों से मिलना-जुलना सारा कुछ इन गतिविधियों के इर्द-गिर्द सिमटा रह जाता है। इतना सब कुछ के बाद नींद में सपने देखने की गुंजाइश भी कहां बची रहती है। अलबत्ता जब कभी बिल्कुल निश्चिंत होकर बिस्तर पर अनमना सा लेटा रहता हूं मोबाइल स्विच ऑफ कर तब मैं अक्सर फ्लैशबैक में चला जाता हूं। आज से 15-20 साल पहले के वक्त में। और बीते लम्हों को याद करते हुए जो खुशी मिलती है, उसे पाना अब मेरे वश में नहीं है। अब जितना कुछ मिल जाए, संतुष्टि नहीं मिलती। कुछ और पाने की चाह हमेशा बनी ही रहती है।
बचपन से सहेजी कुछ खट्टी-मीठी यादों को आज पहली बार कलमबद्ध करने जा रहा हूं। बचपन के बारे में जैसा मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है वैसा लिखना हर किसी के वश में तो नहीं, फिर भी लय, भाव और प्रवाह पर ज्यादा ध्यान न देते हुए मैं जीवन के उन अनमोल पलों को शब्दों में पिरोकर आपके सामने रख रहा हूं। पांच-भाई बहनों में मैं चौथे नंबर पर था। बचपन से ही कृशकाय। अव्वल दर्जे का शरारती। दिमाग से बिल्कुल सुन्न। जो जिद ठान ली, वह हर हाल में पूरी होनी चाहिए....नहीं तो जो कपड़े पहने होते थे, उसे तत्काल फट जाना था। डंडा लेकर बिजली के बल्बों को फोड़ देता था। घर में जो सामान करीने से रखे होते थे, दो मिनट के अंदर आंगन में बिखर जाते थे। अच्छा मेरे पापा को गुस्सा कभी नहीं आता, वह हम भाई-बहनों में से किसी को कभी एक थप्पर भी मारे होंगे यह याद नहीं। इतना ही नहीं वो हमें तुम से भी नहीं बुलाते...हमेशा आप ही कहते हैं। सबको मालूम था, इसे शांत करना है तो या तो इसकी जिद पूरी कर दो या फिर आफत झेलने को तैयार हो जाओ। मां कभी झल्लाकर मारने उठती भी तो दादी बचाव में आ जातीं और फिर बहला-फुसलाकर मुझे शांत कर देतीं।
बचपन में डॉक्टर- डॉक्टर खेलना सीखा। इसी दौरान मैंने मां के सामने फरमाइश रख दी कि मुझे असली वाली सूई-सिरींज चाहिए। मां ने मना किया तो रोना-धोना चालू। खाना भी नहीं खाया और एक घर में रखे संदूक के नीचे जाकर बैठ गया। दादी वहां से मुझे गोदी में उठाकर लाई और पिताजी को फरमान सुनाया कि किसी को भेजकर अभी सूई-सिरींज मंगवा दो। खैर साहब, पिताजी ने एक आदमी को साइकिल लेकर तत्काल बाजार भेजा और दो घंटे के अंदर मेरी फरमाइश पूरी हो गई।
असली करामात तो इसके बाद हुआ। मैंने आनन-फानन में सिरींज में पानी भरा, उस पर सूई लगाई और जो सज्जन बाजार से इसे खरीदकर आए थे चुपके से उन्हीं के कूल्हे पर जाकर ठोक दी। मारे दर्द के वो बिलबिला उठे। मैं फौरन दौड़कर दादी के पास पहुंच गया और खुशी-खुशी अपनी बहादुरी का किस्सा सुना आया। दादी बोली कि अब तो खैर नहीं। तेरे पापा तेरे साथ मुझे भी डांटेंगे। इसीलिए तुमने सूई मंगवायी है। चल ला इसे अभी तोड़ देती हूं। खैर उस दिन तो किसी तरह बच गया। लेकिन इसके एवज में जो कुछ मुझे झेलना पड़ा वो दास्तां कुछ इस प्रकार है। दो-चार दिन के बाद सबसे नजर बचाकर मैं दरवाजे पर आराम से लेटी कुतिया को सूई भोंकने पहुंच गया। ज्यों ही मैंने उसे सूई लगाई, काईं-काईं करते हुए पलटकर उसने मेरे बाएं पांव में दांत गड़ा दिए। मैं बाप-बापकर भागा आंगन की ओर। दरवाजे पर मौजूद नौकरों का ध्यान पड़ा। दौड़कर मुझे उठाया घर में कोहराम मच गया। मां-दादी, दीदी सब भागती हुईं आईं। मैं रोए जा रहा था...लेकिन सूई-सिरींज अब भी हाथ में ही थे, उसे मैंने नहीं छोड़ा था। पापा आए मेरे हाथ से सूई-सिरींज लेकर रख लिए और बड़ी आराम से बोले अब तो मन भर गया ना। ....
इसके बाद का एक और वाकया याद आ रहा है। तब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था।पिताजी ने एक शिक्षक को मुझे ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा था। बाकी एक अन्य शिक्षक थे ही, जो खासतौर पर अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ाते थे। शायद जून का महीना होगा। मैं बनियान पहनकर अपने गणित वाले शिक्षक से पढ़ रहा था। भाग का एक सवाल मैं लगातार गलत बना रहा था। तैश में आकर गुरुजी ने पीठ पर एक जोरदार मुक्का जड़ दिया। कुछ पल तो मैं चुप बैठा रहा, फिर चुपके से उठा और आंगन की ओर बढ़ गया। पांच मिनट के अंदर ही एक कमरे में रखी तलवार घसीटते हुए मैं दरवाजे की ओर दौड़ा। संयोग से मेरी मां की नजर पड़ गई। वो थोड़ी दूर में खड़ी थीं। चिल्लाते हुए वह मुझे पकड़ने के लिए दौड़ीं। फिर पापा को आवाज देते हुए बोलीं कि बौआ (मुझे घर में इसी नाम से बुलाया जाता है) तलवार लेकर जा रहा है, इसको पकड़ लीजिए। पापा लपककर मुझे पकड़ लिए बोले क्या हुआ, क्यों तलवार लेकर आ रहे हैं। मैं जोर से रोते हुए चिल्लाते हुए फट पड़ा- इस साले मास्टर की गरदन उतारकर रख दूंगा। मुझे मारता है...। मां पीछे से शिक्षक को आवाज लगाती हुई बोलीं कि वो भाग जाएं। मास्टर साहब ने हड़बड़ाकर साइकिल उठायी और भाग खड़े हुए। इसके बाद मुझे किसी तरह शांत किया गया।
तो ऐसा था मैं बचपन में। ऐसे ही कुछ और वाकये और फिर मैं कैसे एक शांत और समझदार किशोर बना, उसके बारे में आगे लिखूंगा।
Wednesday, December 19, 2007
वफादार बुचुड़वा
बुचुड़वा नाम है एक शख्स का, उसे दुनिया से गुजरे हुए हो गए होंगे करीब 14 साल। वह मेरे घर का नौकर था। हमारे यहां नीची कही जाने वाली जातियों के लिए ये भी तय रखा जाता था कि उनके बच्चों के नाम क्या रखे जाएंगे। कोई सुनील, अनिल, मोहन, सोहन, उनके घर पैदा नहीं हो सकता। उनके नाम वही होते, जिसका प्रयोग हिकारत भरे शब्दों के लिए हो सकता हो। जैसे छूतहरबा (मैथिली में छूतहर का मतलब होता है बदचलन), करिया (काला), बौका (गूंगा भले ही वो वाचाल ही क्यों न हो) आदि। हालांकि विगत 15 सालों में अपने गांव में ही मैंने किसी बच्चे का ऐसा कोई नाम नहीं सुना है। हालात अब काफी बदल चुके हैं। लेकिन बुचुड़वा जिस दौर में था, उस समय की स्थितियां अलग थीं। सामंती व्यवस्था किसे कहते हैं, उसका बहुत करीब से साक्षी रहा हूं।
पिताजी गांव के ही नहीं बल्कि जिले या कहें कि कमीश्नरी भर के कुछ चुनिंदा रसूखदार जमींदारों में गिने जाते हैं। गांव के लिए उन्होंने जितना कुछ किया है, वह बहुत से अमीरों के लिए एक सपना हो सकता है। गांव में प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक बनवाए हैं उन्होंने। बहुत सम्मानित और इज्जतदार गांव में उनकी गिनती निहायत ही शांत और ईमानदार शख्स के रूप में होती है। आज भी जिले भर के तमाम अफसर हमारे घर पर दावत में शरीक होते हैं। तमाम खूबियां हैं उनके अंदर। लेकिन जिस प्रसंग का मैं यहां जिक्र करने जा रहा हूं, वह एक दृष्टांत है कथित सामंतवाद के उस चेहरे का जहां शोषक और शोषित के संबंधों में मानवीय पहलू दबकर रह जाते हैं। वहां दया और करुणा सिर्फ और सिर्फ एक काल्पनिक सच्चाई भर बनकर रह जाती है।
मेरे दरवाजे पर दर्जन भर नौकरों की जो फौज थी, उसमें बुचुड़वा सबसे ईमानदार और कर्मठ माना जाता था। जाति से वह मुसहर था। किसी भी काम में भिड़ा दो बुचुड़वा जब तक उसे निबटा लेता तब तक दम मारने को भी नहीं बैठ सकता था। हां, खुराक वह तीन आदमियों के बराबर लेता था और दही-दूध, मांस-मछली का बड़ा प्रेमी था। मां के चहेते नौकरों में से था, क्योंकि घर के सब काम के अलावा बिस्तर, कंबल सुखाने और बाड़ी से साग-सब्जियां लाने का काम भी वह कर देता था। इसलिए मां उसके खाने-पीने में कोई कटौती नहीं होने देती। बुचुड़वा का पूरा परिवार मतलब उसकी बीवी, दो बेटे और दो बेटियां सब हमारे यहां खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करते। हमारे दादा ने 50 से अधिक मुसहर परिवारों को जमीन देकर उनका घर बसाया था और वे सभी हमारे यहां मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। बाद में मैंने समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा कि इसे बंधुआ मजदूरी कहते हैं। तो बुचुड़वा का परिवार भी इन्हीं में से एक था। बुचुड़वा बड़ा ताकतवर था, क्योंकि क्विंटल भर अनाज की बोरियों को अपनी पीठ पर लादकर वह बड़ी आसानी से ट्रैक्टर-ट्राली से उठाकर गोदाम में रख देता। जून की तपती गर्मी में वह बांस के मोटे डंडे से डेंगाकर दिनभर में मूंग की फलियों से कई बोरियां दाने भर लेता। दिन भर काम करने के बाद वह रात को अपने घर सोने चला जाता।
जाड़े का मौसम था। एक रात हम सब भाई-बहन अपनी मां के साथ सो रहे थे। आधी रात के वक्त करीब बुचुड़वा दौड़ता हुआ और दरवाजे पर औंधे लेटे पहरेदार को उठाते हुए कहा कि पास वाले स्कूल में कई डकैत बैठे हुए हैं, मालिक (मेरे पिताजी को सभी मालिक कहते हैं) को जल्दी उठा दीजिए। फिर वह हमारे कमरे के पास खिड़की को जोर-जोर से पीटते हुए बोल रहा था, मालकिन जल्दी मालिक को उठाइए...स्कूल पर बहुत से डकैत बैठे हुए हैं। हम सब बच्चों की नींद खुल गई। तब तक पापा भी अपने कमरे से निकल आए थे। उन्होंने पूछा तो डर से थरथर कांपते बुचुड़वा ने कहा कि मालिक जल्दी बंदूक निकालकर छत पर चले जाइए डकैत सब इधर ही बढ़ रहा है। घर के सारे नौकर-पहरेदार भाला-फरसा, तीर-धनुष लेकर शोर मचाने लगे। पापा भी हमसब को साथ लेकर छत पर चढ़ गए। पड़ोस के लोग भी जाग गए थे। हमलोगों के तरफ से दनादन फायरिंग की जाने लगी। शायद डकैतों की हिम्मत नहीं हुई और वे भाग खड़े हो गए। सुबह जब स्कूल पर लोग पहुंचे तो वहां शराब की बोतलें आदि पड़ी हुई थीं। एक झोला भी मिला। बाद में पुलिस को भी सूचना दी गई। पापा-मम्मी, आस-पड़ोस और गांव के सारे लोग बुचुड़वा की वफादारी की चर्चा करते नहीं अघा रहे। लेकिन बुचुड़वा...उसे प्रशंसा से कहीं ज्यादा इस बात की खुशी मिल रह थी कि ईश्वर की कृपा से वह अपने धर्म से नहीं चूका। धर्म यही कि अन्नदाता पर आने वाली विपत्ति को वह टाल सका और ईश्वर की कृपा इसलिए कि अगर वह लघुशंका करने रात में अपनी झोपड़ी से बाहर नहीं निकलता तो उसे यह आभास ही नहीं होता कि सामने स्कूल में कुछ लोग बैठे हुए हैं और उनके कंधों पर हथियार लटक रहे हैं।
इस घटना को गुजरे हुए 20 साल से कम नहीं हुए होंगे। वक्त यूं ही गुजरता रहा और मालिक का वफादार बुचुड़वा अचानक एक दिन बीमार हो गया। उसकी पत्नी आई और बतायी कि जहरा का बाप यानी बुचुड़वा को बुखार हो गया है। तीन-चार दिन तक जब उसका बुखार न टूटा तो पिताजी को बुचुड़वा की कमी खलने लगी, कई काम दूसरे नौकरों से संभल ही नहीं पा रहा था। पिताजी ने बुचुड़वा की पत्नी को उसके इलाज के वास्ते कुछ पैसे दिए। गांव के झोलाछाप डॉक्टर ने सूई-दवाई दी मगर उसकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ। उसकी बीवी चार-पांच दिन बाद फिर पैसे मांगने आई...मगर पिताजी ने मना कर दिया, बोले कि अभी तो दिए ही हैं...कुछ खुद भी इंतजाम करो। दो-जून रोटी के लिए दिनभर मेहनत करने वाली उस औरत के पास पैसे कहां से आ सकते हैं, यह सोचनी वाली बात है। वह मां के पास जाकर रोने-बिलखने लगी...मां ने उसे चुपके से पैसे दे दिए। करीब 20 दिन गुजर गए, बुचुड़वा की तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ती ही रही। उस हालत में भी उसकी बीवी और उसके बेटे काम करने के लिए आते ही रहे। एक दिन मेरे ब्लॉक के डॉक्टर किसी काम से दरवाजे पर आए, तभी पिताजी को ख्याल आया कि बुचुड़वा को इनसे दिखला दिया जाए। उन्होंने तुरंत किसी आदमी को बुचुड़वा को रिक्शा पर लादकर लाने के लिए कह दिया। डॉक्टर ने बुचुड़वा के लिए कुछ टेस्ट तत्काल करवाने की हिदायत देते हुए दवाईयां लिख दीं और कहा कि टेस्ट की रिपोर्ट जरूर दिखा दें। डॉक्टरी जांच में पता चल गया कि उसे टीबी हो गई है। लेकिन अच्छे खानपान और नियमित इलाज से सुधार हो सकता है। मगर ऐसा हो नहीं सका और एक महीने के भीतर ही बुचुड़वा ने सदा-सदा के लिए आंखें मूंद ली। घर में किसी ने आकर बताया। मां की आंखों में आंसू भर गए और वे सुबकने लगीं हम भाई-बहन भी बड़ी उदास हो गए, मगर पापा.... आंगन में आकर बोले अरे टीबी हो गया था उसे, बचने की संभावना ही कहां थी उसकी। बुचुड़वा के इलाज और श्राद्ध में जो पैसे खर्च हुए वो पिताजी ने ही दिए थे और इसके एवज में उसका बेटा साल भर हमारे यहां काम करके कर्जा चुकाता रहा और अपने बाप की वफादारी उसकी मौत के बाद भी निभाता रहा। (यह सौ फीसदी सच्ची कहानी है, मगर कालक्रम पुराना है। स्थितियां अब बिल्कुल बदल चुकी हैं और कथित सामंतवाद का चेहरा अब काफी धुंधला हो चुका है।)
पिताजी गांव के ही नहीं बल्कि जिले या कहें कि कमीश्नरी भर के कुछ चुनिंदा रसूखदार जमींदारों में गिने जाते हैं। गांव के लिए उन्होंने जितना कुछ किया है, वह बहुत से अमीरों के लिए एक सपना हो सकता है। गांव में प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक बनवाए हैं उन्होंने। बहुत सम्मानित और इज्जतदार गांव में उनकी गिनती निहायत ही शांत और ईमानदार शख्स के रूप में होती है। आज भी जिले भर के तमाम अफसर हमारे घर पर दावत में शरीक होते हैं। तमाम खूबियां हैं उनके अंदर। लेकिन जिस प्रसंग का मैं यहां जिक्र करने जा रहा हूं, वह एक दृष्टांत है कथित सामंतवाद के उस चेहरे का जहां शोषक और शोषित के संबंधों में मानवीय पहलू दबकर रह जाते हैं। वहां दया और करुणा सिर्फ और सिर्फ एक काल्पनिक सच्चाई भर बनकर रह जाती है।
मेरे दरवाजे पर दर्जन भर नौकरों की जो फौज थी, उसमें बुचुड़वा सबसे ईमानदार और कर्मठ माना जाता था। जाति से वह मुसहर था। किसी भी काम में भिड़ा दो बुचुड़वा जब तक उसे निबटा लेता तब तक दम मारने को भी नहीं बैठ सकता था। हां, खुराक वह तीन आदमियों के बराबर लेता था और दही-दूध, मांस-मछली का बड़ा प्रेमी था। मां के चहेते नौकरों में से था, क्योंकि घर के सब काम के अलावा बिस्तर, कंबल सुखाने और बाड़ी से साग-सब्जियां लाने का काम भी वह कर देता था। इसलिए मां उसके खाने-पीने में कोई कटौती नहीं होने देती। बुचुड़वा का पूरा परिवार मतलब उसकी बीवी, दो बेटे और दो बेटियां सब हमारे यहां खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करते। हमारे दादा ने 50 से अधिक मुसहर परिवारों को जमीन देकर उनका घर बसाया था और वे सभी हमारे यहां मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। बाद में मैंने समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा कि इसे बंधुआ मजदूरी कहते हैं। तो बुचुड़वा का परिवार भी इन्हीं में से एक था। बुचुड़वा बड़ा ताकतवर था, क्योंकि क्विंटल भर अनाज की बोरियों को अपनी पीठ पर लादकर वह बड़ी आसानी से ट्रैक्टर-ट्राली से उठाकर गोदाम में रख देता। जून की तपती गर्मी में वह बांस के मोटे डंडे से डेंगाकर दिनभर में मूंग की फलियों से कई बोरियां दाने भर लेता। दिन भर काम करने के बाद वह रात को अपने घर सोने चला जाता।
जाड़े का मौसम था। एक रात हम सब भाई-बहन अपनी मां के साथ सो रहे थे। आधी रात के वक्त करीब बुचुड़वा दौड़ता हुआ और दरवाजे पर औंधे लेटे पहरेदार को उठाते हुए कहा कि पास वाले स्कूल में कई डकैत बैठे हुए हैं, मालिक (मेरे पिताजी को सभी मालिक कहते हैं) को जल्दी उठा दीजिए। फिर वह हमारे कमरे के पास खिड़की को जोर-जोर से पीटते हुए बोल रहा था, मालकिन जल्दी मालिक को उठाइए...स्कूल पर बहुत से डकैत बैठे हुए हैं। हम सब बच्चों की नींद खुल गई। तब तक पापा भी अपने कमरे से निकल आए थे। उन्होंने पूछा तो डर से थरथर कांपते बुचुड़वा ने कहा कि मालिक जल्दी बंदूक निकालकर छत पर चले जाइए डकैत सब इधर ही बढ़ रहा है। घर के सारे नौकर-पहरेदार भाला-फरसा, तीर-धनुष लेकर शोर मचाने लगे। पापा भी हमसब को साथ लेकर छत पर चढ़ गए। पड़ोस के लोग भी जाग गए थे। हमलोगों के तरफ से दनादन फायरिंग की जाने लगी। शायद डकैतों की हिम्मत नहीं हुई और वे भाग खड़े हो गए। सुबह जब स्कूल पर लोग पहुंचे तो वहां शराब की बोतलें आदि पड़ी हुई थीं। एक झोला भी मिला। बाद में पुलिस को भी सूचना दी गई। पापा-मम्मी, आस-पड़ोस और गांव के सारे लोग बुचुड़वा की वफादारी की चर्चा करते नहीं अघा रहे। लेकिन बुचुड़वा...उसे प्रशंसा से कहीं ज्यादा इस बात की खुशी मिल रह थी कि ईश्वर की कृपा से वह अपने धर्म से नहीं चूका। धर्म यही कि अन्नदाता पर आने वाली विपत्ति को वह टाल सका और ईश्वर की कृपा इसलिए कि अगर वह लघुशंका करने रात में अपनी झोपड़ी से बाहर नहीं निकलता तो उसे यह आभास ही नहीं होता कि सामने स्कूल में कुछ लोग बैठे हुए हैं और उनके कंधों पर हथियार लटक रहे हैं।
इस घटना को गुजरे हुए 20 साल से कम नहीं हुए होंगे। वक्त यूं ही गुजरता रहा और मालिक का वफादार बुचुड़वा अचानक एक दिन बीमार हो गया। उसकी पत्नी आई और बतायी कि जहरा का बाप यानी बुचुड़वा को बुखार हो गया है। तीन-चार दिन तक जब उसका बुखार न टूटा तो पिताजी को बुचुड़वा की कमी खलने लगी, कई काम दूसरे नौकरों से संभल ही नहीं पा रहा था। पिताजी ने बुचुड़वा की पत्नी को उसके इलाज के वास्ते कुछ पैसे दिए। गांव के झोलाछाप डॉक्टर ने सूई-दवाई दी मगर उसकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ। उसकी बीवी चार-पांच दिन बाद फिर पैसे मांगने आई...मगर पिताजी ने मना कर दिया, बोले कि अभी तो दिए ही हैं...कुछ खुद भी इंतजाम करो। दो-जून रोटी के लिए दिनभर मेहनत करने वाली उस औरत के पास पैसे कहां से आ सकते हैं, यह सोचनी वाली बात है। वह मां के पास जाकर रोने-बिलखने लगी...मां ने उसे चुपके से पैसे दे दिए। करीब 20 दिन गुजर गए, बुचुड़वा की तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ती ही रही। उस हालत में भी उसकी बीवी और उसके बेटे काम करने के लिए आते ही रहे। एक दिन मेरे ब्लॉक के डॉक्टर किसी काम से दरवाजे पर आए, तभी पिताजी को ख्याल आया कि बुचुड़वा को इनसे दिखला दिया जाए। उन्होंने तुरंत किसी आदमी को बुचुड़वा को रिक्शा पर लादकर लाने के लिए कह दिया। डॉक्टर ने बुचुड़वा के लिए कुछ टेस्ट तत्काल करवाने की हिदायत देते हुए दवाईयां लिख दीं और कहा कि टेस्ट की रिपोर्ट जरूर दिखा दें। डॉक्टरी जांच में पता चल गया कि उसे टीबी हो गई है। लेकिन अच्छे खानपान और नियमित इलाज से सुधार हो सकता है। मगर ऐसा हो नहीं सका और एक महीने के भीतर ही बुचुड़वा ने सदा-सदा के लिए आंखें मूंद ली। घर में किसी ने आकर बताया। मां की आंखों में आंसू भर गए और वे सुबकने लगीं हम भाई-बहन भी बड़ी उदास हो गए, मगर पापा.... आंगन में आकर बोले अरे टीबी हो गया था उसे, बचने की संभावना ही कहां थी उसकी। बुचुड़वा के इलाज और श्राद्ध में जो पैसे खर्च हुए वो पिताजी ने ही दिए थे और इसके एवज में उसका बेटा साल भर हमारे यहां काम करके कर्जा चुकाता रहा और अपने बाप की वफादारी उसकी मौत के बाद भी निभाता रहा। (यह सौ फीसदी सच्ची कहानी है, मगर कालक्रम पुराना है। स्थितियां अब बिल्कुल बदल चुकी हैं और कथित सामंतवाद का चेहरा अब काफी धुंधला हो चुका है।)
Monday, December 17, 2007
शिकायत क्यों, दमखम दिखाओ
हमारे पत्रकार बंधुओं में से कई को ये शिकायत है कि जो सोचा था, प्रोफेशनल लाइफ में वैसा कुछ हो नहीं रहा। टीवी जगत से जुड़े पत्रकारों में से कुछ कहते हैं कि भाई हम तो हाई पेड क्लर्क बनकर रह गए हैं। जो कर रहे हैं उसमें पत्रकारिता कहां। बस समझो कि पैसे मिल रहे हैं, लेकिन जो सोचकर पत्रकार बना था, वह मन में धरी की धरी ही रह गई। कितने तो कहते हैं- कहां यार पैसे ही नहीं मिलते हैं, किसी और फील्ड में होता तो इससे बेहतर स्थिति में होता। मेरे पल्ले ये नहीं पड़ रहा कि हमारे ये मित्र क्या सोचकर-समझकर और निर्धारित करके इस प्रोफेशन में उतरे थे। संस्थान में हमारे जन्मजात पत्रकार बिरादरी के मित्र तो ये तय कर बैठे थे कि डिग्री हाथ में लेते ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश मिल जाएगा है और फिर बड़े-बड़े नेताओं के मुंह में माइक ठूंसकर उन पर सवालों की बौछार कर देनी है। दुनिया देखेगी क्या तेवर है बंदे के अंदर, इसके सवालों के आगे कैसे बड़े-बड़े नेता फक्क पड़ जाते हैं, जवाब देते नहीं बनता है। ऐसे तमाम ख्यालात उनके दिमाग में बैठे हुए थे। होना भी चाहिए। भाई पत्रकार वही, जो बेधड़क सवाल कर सके और जिसमें हो भरपूर आत्मविश्वास। हमारे उन मित्रों में आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं थी, लेकिन जहां तक मेरी समझ कह रही थी कि उनमें से गिनती के दो या तीन ही ऐसे थे, जिन्हें देश की राजनीति और राजनेताओं के बारे में ठीकठाक जानकारी थी। कुछ की रुचि फिल्मों में थी, तो उन्हें समकालीन चॉकलेटी हीरो और ग्लैमरस हीरोइनों के अलावा ये पता नहीं था कि निर्माता और निर्देशक में क्या अंतर होता है, और कोरियोग्राफर किसे कहते हैं। वैसे पाठ्यक्रम शुरू होने के समय से अपने बैच के जिस लड़के के साथ मैं रूम शेयर कर रहा था, वह मुझे मेरी सामान्य ज्ञान की जानकारी के लिए खूब शाबासी दिया करता था। लेकिन मुझे लगता था कि इतना तो हर कोई जानता है, हां वह मित्र इस मामले में थोड़ा कमजोर था तो उसे मेरी जानकारी बड़ी लगती थी। एक बार एक टीवी टॉक शो के लिए संस्थान के छात्रों को आमंत्रित किया गया। उन्हें प्रोग्राम में सवाल पूछने के लिए इसे लिखित रूप में पहले देने को कहा गया। हमारे ऊर्जावान पत्रकार मित्रों में से जो सबसे ज्यादा अपने को तीसमारखां समझते थे, उन्हें कोई सवाल ही नहीं सूझ रहा था। खैर उन्होंने कोई सवाल लिखकर दिया जो बाद में प्रोग्राम के एंकर ने रिजेक्ट कर दिया। मैंने दो सवाल दिए, संयोग से दोनों ही चुन लिए गए। जामिया विश्वविद्यालय में जिस दिन शूटिंग होने वाली थी, वो मित्र मेरे पास आए और बोले कि इसमें से एक सवाल मैं पूछ लूं...मैंने तुरंत हां कर दी। वैसे भी उन जैसे मित्रों से बनाकर रखने में ही अपनी भलाई थी और उनके साथ अगर थोड़ी देर बात हो जाए तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती। लेकिन इस छोटी घटना से मुझे बड़ा फायदा मिला। मुझे लगा कि मैं बेवजह जरूरत से ज्यादा डरा रहता हूं और इन लोगों से बहुत पीछे नहीं हूं। हकीकत की ये कहानी बहुत लंबी न हो जाए इसलिए मुद्दे की बात पर लौटना श्रेयस्कर है।... तो जो हमारे मित्र स्नातक के स्तर पर इतनी जानकारी लेकर पत्रकारिता संस्थान में दाखिला लिए थे उनके भविष्य के बारे में अंदाजा आप ही लगाएं तो बेहतर हैं। फिर भी उन्हें मौका मिला है और वे आज की तारीख में खप रहे हैं, यही कम बड़ी बात नहीं है। बस इसलिए कि अब वे एक्सपीरियंस्ड हो रहे हैं, पेशे की जरूरतों के मुताबिक खुद को ढाल रहे हैं, अच्छे संस्थानों से जुड़े हुए हैं और अपेक्षाकृत बढ़िया कमा रहे हैं। तो फिर शिकवा-शिकायत कैसी... शुक्र मनाएं कि इतनी कमियों के बावजूद आप इस स्तर तक पहुंचने में सफल तो हुए। वरना अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाकर देखें कितने लोग ऐसे दिख जाएंगे जिनकी काबिलियत के आगे हमलोग कहीं नहीं टिकते, लेकिन फिर भी वे उस जगह को पाने के लिए आजतक तरस रहे हैं। आप तो खुशी मनाओ और अपनी तकदीर पर इतराओ कि औरों से आप बहुत आगे हैं। रही बात "परिभाषीय पत्रकारिता" करने की तो उसके लिए कई तरह के ऑपश्न मौजूद हैं। अखबार-पत्रिकाओं में आलेख लिखो...अपने संस्थान में ही कई मौके होंगे आपके लिए जहां आप कोई स्पेशल प्रोग्राम के लिए स्क्रिप्ट लिख सकते हैं, लिखने-पढ़ने के अवसरों से आप वंचित नहीं है। बस हिम्मत दिखाओ और स्यापा करना छोड़ दो।
Monday, December 10, 2007
अब तो बदल जाओ...
आईआईएमसी के हिन्दी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में मेरे जितने भी साथी थे, उनमें से अधिकतर बिहार और उत्तर प्रदेश से थे। इनमें से भी अधिकांश वैसे थे जो पत्रकारिता के क्षेत्र में इसलिए आ रहे थे या कहें कि घुस रहे थे क्योंकि सरकारी नौकरियों में प्रवेश के अवसर सीमित हो गए थे। कुछ सिविल सविर्सेज की तैयारी में जुटे थे और पत्रकारिता के रूप में एक ऑप्शन बनाए रखना चाहते थे कि अगर हाकिम नहीं बन पाया तो कम से कम पत्रकार तो बन ही ए चार-पांच लोग थे जो सचमुच लिखत-पढ़त में शौक रखते थे और पत्रकारिता को कैरियर की दृष्टि से अपनाने आए थे। मेरे जैसे दो-चार जने ऐसे भी थे जो सिर्फ नौकरी पाने के लिए इधर खिसक आए थे। अब आते हैं असली बात पर। जो कुछ मैं यहां लिखने जा रहा हूं, उसे मैं कभी भी अपने उन सम्माननीय मित्रों के सामने कहने की हिम्मत नहीं कर सकता हूं, क्योंकि उनकी जो आभा है उसकी चमक से मेरी आंखें चौंधिया जाती हैं, जुबान लड़खड़ाने लगती है और मैं कुछ बोल नहीं पाता हूं। दब्बू स्वभाव का जो ठहरा। उनके अंदर जो खासियतें और खामियां हैं उनसे नौ महीने के पत्रकारिता प्रशिक्षण सत्र के दौरान अच्छी तरह से वाकिफ हो चुका था। बढ़ चढ़कर बोलना, किसी भी सवाल के जवाब में नया सवाल दाग देना, दूसरों पर हावी होने के लिए मौका मिलते ही उसकी खिंचाई कर देना... इन तमाम फनों में वो माहिर हो रहे थे। शायद एक सफल पत्रकार बनने के लिए ये आवश्यक गुण हैं? तमाम साथियों के लिए अलग-अलग उपनाम विकसित कर अपना शब्दकोश भी समृद्ध कर लिया। संस्थान में आकर पढ़ाई करना उनके लिए जरूरी नहीं था, क्योंकि वे तो जन्मजात पत्रकार थे और हमारे जैसे जो चुपचाप और थोड़ा सहमे से रहने वाले छात्र थे उनके सामने अपनी विद्वता का बखान करने से कभी नहीं चूकते थे। हमें लगता था कि प्रशिक्षण के बाद जब नौकरी ढूंढ़ने का वक्त आएगा तो हम तो इन लोगों मुकाबले कहीं टिक ही नहीं पाएंगे। कितना आत्मविश्वास से भरे होते थे हमारे वे सारे सम्माननीय मित्र। वे कभी प्यार से आकर अगर हमसे बातें भी कर लेते थे तो हम कृत्य-कृत्य हो जाते थे, वरना हम अपने दो-चार दोस्तों के दायरे में ही सिमटे रहते। मैं तो बस इतनी आस पाले बैठा था कि अप्रैल में जैसे ही कोर्स खत्म हो, मुझे कहीं नौकरी मिल जाए 4 हजार तक की। मेरे दोस्तों में से कुछ एक-दो अध्यापकों के केबिन के खास मेहमान जैसे थे, अक्सर वहां बैठकर जुगाड़ तलाशने की जुगत भिड़ाते रहते थे। फिर ऐसा हुआ कि इंटर्नशिप से पहले-पहले ही एक प्रतिष्ठित अखबार में ट्रेनी जर्नलिस्टों के लिए भर्ती का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। सारे छात्र उसमें शामिल हुआ, लेकिन जब उक्त अखबार के दफ्तर से सूचना प्राप्त हुई तो हमारे शेखीबाज दोस्तों की हवा निकल गई। वहां चार छात्र चयनित हुए और इसमें कोई दो राय नहीं थी कि वे चारों के चारों बकायदा अपनी मेधा और काबलियत साबित करके ही इसमें सफलता हासिल कर सके। हमारे हवाबाज दोस्तों के दंभ में कुछ कमी आई और अब इन चारों की पूछ बढ़ गई। जो चार लड़के चयनित हुए उनमें से तो एक को संस्थान में मेरे जैसे दो-चार लड़कों के अलावा कोई पूछता नहीं था, हमारे जन्मजात पत्रकार लोग तो खासकर नहीं। लेकिन इस सफलता ने उसके प्रति उन बुद्धिजीवियों की सोच में थोड़ा फर्क तो जरूर ला दिया। खैर साहब सब के सब जुटे रहे। कुछ जो ज्यादा चतुर-सुजान थे उन्होंने एक टीवी चैनल में नौकरी हासिल कर ली और मेहनत करते हुए आज अच्छे ओहदों तक पहुंच गए हैं। कुछ जिनके पास सिवाय मीडिया हाउसों के दफ्तरों के चक्कर काटने के और कोई चारा नहीं था, उनमें से अधिकतर ने बाद में नौकरी तो हासिल कर ली, लेकिन कोई तीसमारखां वाली स्थिति उनकी अभी नहीं बन पाई है। प्रिंट से शुरुआत करके एक मित्र टीवी माध्यम का रुख कर लिए और वहां जाकर धड़ाधड़ तीन-चार नौकरियां बदलकर आज बहुत अच्छी पोजिशन में हैं। वहीं एक मित्र ने समाचार एजेंसी से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का सफर करीब तीन साल में तय करने के बाद साल भर में ही व्यथित, दुखित और आहत होकर वहां से विदा होने का मन बना लिया है। मित्रों में मित्र कहे जा सकते हैं हमारे एक साथी, जिन्होंने अपनी शारीरिक अपंगता के बावजूद संघर्ष करते हुए सफलता हासिल की। उनकी जिंदादिली के कायल हमारे बैच के सभी साथी हैं। अब बात हमारे कुछ ऐसे साथियों की जो कभी उस मंडली के सक्रिय सदस्य होते थे, जिन्हें जन्मजात पत्रकार होने का गर्व था, लेकिन कामयाबी के मामले में थोड़ा पीछे रह गए हैं (वैसे हम जैसों से तो आगे ही होंगे)। अब उनका दर्प, उनका बड़बोलापन सब फुर्र हो चुका ...वैसे भैया हम तो आपको हमेशा से सम्मान की नजरों से देखते रहे हैं तो आपको शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। दिन का फेर है सब...आपने गुजरे दिनों में जितना हांका, उतना नहीं पा सके या दिखा सके तो इसमें कोई बुराई नहीं, मगर हां हांकने की फितरत कम से कम अब तो बदल लो.... (ये आलेख अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन आज फिलहाल इतना ही।)
Friday, December 7, 2007
लो जी हम भी आ गए
मुझे थोड़ा नजदीक से जानने वाले मित्रों को तनिक भी यह भ्रम नहीं होगा कि मैं कोई लिक्खड़ पत्रकार हूं और विचारों के स्तर पर बहुत बुलंद हूं। विचार तो मेरे मन में भी उठते हैं लेकिन वह ज्यादा विस्तार पा सके इससे पहले ही दिमाग के किसी कोने में दबकर रह जाते हैं। वजह...भाई स्वभाव में गंभीरता नहीं है और लेखनी कमजोर है। इसलिए मैं बोलता कम और सुनता ज्यादा हूं। बोलूं तो शब्दों का टोटा हो जाता है... इसलिए चुपचाप सुन लेने में ही भलाई मानता हूं। दो महीने पहले नई नौकरी ज्वाइन की है और अभी काम का ज्यादा दबाव नहीं है या यूं कहे कि काम ही नहीं है। खाली समय में इंटरनेट पर यूं ही कुछ-कुछ खोजता रहता हूं...इसी क्रम में कुछ मित्रों के ब्लॉग से जा टकराया। देखा काफी कुछ लिखा-पढ़ा है हमारे साथियों ने। दो-चार दिन के अंतराल पर किसी नए मित्र के ब्लॉग का लिंक भी मेल पर आ जाता है। जाहिरा तौर पर ये सभी "पत्रकार" ही हैं और शब्दों से खेलने की बाजीगरी हासिल है इन्हें। क्या जबरदस्त लिखते हैं...छोटी-मोटी बातों को भी इतना विस्तार देते हैं और उसका इतने शानदार तरीके से विश्लेषण करते हैं कि कई मर्तबा अपने मूढ़ मगज के दरवाजे हिल गए। हां इनमें से कुछ मित्र ऐसे भी हैं जो कुछ ज्यादा ही लंबी छलांग मारते हैं। इतना कि मुझे लगता है कि अगर संभव होता तो उनके शब्द गोला बनकर लक्षित निशाने को भेद आते। ऐसा तो नहीं हो पाता है, लेकिन हां फिजूल की एक बहस जरूर छिड़ती है ब्लॉग पर और लगे हाथों दो-चार कमेन्ट्स भी आ जाते हैं... भाई इसी बहाने हमारे अजीज दोस्त कुछ लोगों के बीच चर्चा के विषय तो बन ही जाते हैं। काफी दिनों तक मैं उधेड़बुन में रहा कि क्यूं नहीं अपनी छोटी बुद्धि के मुताबिक कुछ राय व्यक्त करने के लिए उस मित्र को एक कमेन्ट भेज दूं... अपनी औकात में रहकर थोड़ा सलाह-सुझाव भी दे दूं। इसी सोच-विचार के तहत ये निष्कर्ष निकाला कि अच्छा हो कि अपना ही कोई ब्लॉग बना लूं। वैसे भी अभी ऑफिस में खाली ही रहता हूं तो इसी बहाने थोड़ा टाइपिंग का अभ्यास भी हो जाएगा। तो इसी ख्याल के तहत ये ब्लॉग आपके सामने है। ब्लॉग का उद्देश्य क्या है ये तो अभी मैं तय नहीं कर पाया हूं, हां इतना जरूर है कि एकाध महीने इस पर लिखूंगा और धड़ाधड़ लिखूंगा... इन लिखित विचारों का स्तर कैसा होगा इसके लिए सबसे पहले लिखी लाइन को ध्यान में रखें तो उचित होगा...हां एक बात तय है कि नाम के अनुरूप इस ब्लॉग में लिखी गई बातें तल्ख जरूर होंगी, लेकिन शालीनता के दायरे में।
ले-आउट ज्यादा आकर्षक नहीं बन पाया है, क्योंकि इसके कई फीचर अभी मेरी समझ में नहीं आ रहे हैं। धीरे-धीरे इसकी साजसज्जा निखरती जाए इसके लिए प्रयास जारी रहेगा।
ले-आउट ज्यादा आकर्षक नहीं बन पाया है, क्योंकि इसके कई फीचर अभी मेरी समझ में नहीं आ रहे हैं। धीरे-धीरे इसकी साजसज्जा निखरती जाए इसके लिए प्रयास जारी रहेगा।
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