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Monday, December 17, 2007
शिकायत क्यों, दमखम दिखाओ
हमारे पत्रकार बंधुओं में से कई को ये शिकायत है कि जो सोचा था, प्रोफेशनल लाइफ में वैसा कुछ हो नहीं रहा। टीवी जगत से जुड़े पत्रकारों में से कुछ कहते हैं कि भाई हम तो हाई पेड क्लर्क बनकर रह गए हैं। जो कर रहे हैं उसमें पत्रकारिता कहां। बस समझो कि पैसे मिल रहे हैं, लेकिन जो सोचकर पत्रकार बना था, वह मन में धरी की धरी ही रह गई। कितने तो कहते हैं- कहां यार पैसे ही नहीं मिलते हैं, किसी और फील्ड में होता तो इससे बेहतर स्थिति में होता। मेरे पल्ले ये नहीं पड़ रहा कि हमारे ये मित्र क्या सोचकर-समझकर और निर्धारित करके इस प्रोफेशन में उतरे थे। संस्थान में हमारे जन्मजात पत्रकार बिरादरी के मित्र तो ये तय कर बैठे थे कि डिग्री हाथ में लेते ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश मिल जाएगा है और फिर बड़े-बड़े नेताओं के मुंह में माइक ठूंसकर उन पर सवालों की बौछार कर देनी है। दुनिया देखेगी क्या तेवर है बंदे के अंदर, इसके सवालों के आगे कैसे बड़े-बड़े नेता फक्क पड़ जाते हैं, जवाब देते नहीं बनता है। ऐसे तमाम ख्यालात उनके दिमाग में बैठे हुए थे। होना भी चाहिए। भाई पत्रकार वही, जो बेधड़क सवाल कर सके और जिसमें हो भरपूर आत्मविश्वास। हमारे उन मित्रों में आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं थी, लेकिन जहां तक मेरी समझ कह रही थी कि उनमें से गिनती के दो या तीन ही ऐसे थे, जिन्हें देश की राजनीति और राजनेताओं के बारे में ठीकठाक जानकारी थी। कुछ की रुचि फिल्मों में थी, तो उन्हें समकालीन चॉकलेटी हीरो और ग्लैमरस हीरोइनों के अलावा ये पता नहीं था कि निर्माता और निर्देशक में क्या अंतर होता है, और कोरियोग्राफर किसे कहते हैं। वैसे पाठ्यक्रम शुरू होने के समय से अपने बैच के जिस लड़के के साथ मैं रूम शेयर कर रहा था, वह मुझे मेरी सामान्य ज्ञान की जानकारी के लिए खूब शाबासी दिया करता था। लेकिन मुझे लगता था कि इतना तो हर कोई जानता है, हां वह मित्र इस मामले में थोड़ा कमजोर था तो उसे मेरी जानकारी बड़ी लगती थी। एक बार एक टीवी टॉक शो के लिए संस्थान के छात्रों को आमंत्रित किया गया। उन्हें प्रोग्राम में सवाल पूछने के लिए इसे लिखित रूप में पहले देने को कहा गया। हमारे ऊर्जावान पत्रकार मित्रों में से जो सबसे ज्यादा अपने को तीसमारखां समझते थे, उन्हें कोई सवाल ही नहीं सूझ रहा था। खैर उन्होंने कोई सवाल लिखकर दिया जो बाद में प्रोग्राम के एंकर ने रिजेक्ट कर दिया। मैंने दो सवाल दिए, संयोग से दोनों ही चुन लिए गए। जामिया विश्वविद्यालय में जिस दिन शूटिंग होने वाली थी, वो मित्र मेरे पास आए और बोले कि इसमें से एक सवाल मैं पूछ लूं...मैंने तुरंत हां कर दी। वैसे भी उन जैसे मित्रों से बनाकर रखने में ही अपनी भलाई थी और उनके साथ अगर थोड़ी देर बात हो जाए तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती। लेकिन इस छोटी घटना से मुझे बड़ा फायदा मिला। मुझे लगा कि मैं बेवजह जरूरत से ज्यादा डरा रहता हूं और इन लोगों से बहुत पीछे नहीं हूं। हकीकत की ये कहानी बहुत लंबी न हो जाए इसलिए मुद्दे की बात पर लौटना श्रेयस्कर है।... तो जो हमारे मित्र स्नातक के स्तर पर इतनी जानकारी लेकर पत्रकारिता संस्थान में दाखिला लिए थे उनके भविष्य के बारे में अंदाजा आप ही लगाएं तो बेहतर हैं। फिर भी उन्हें मौका मिला है और वे आज की तारीख में खप रहे हैं, यही कम बड़ी बात नहीं है। बस इसलिए कि अब वे एक्सपीरियंस्ड हो रहे हैं, पेशे की जरूरतों के मुताबिक खुद को ढाल रहे हैं, अच्छे संस्थानों से जुड़े हुए हैं और अपेक्षाकृत बढ़िया कमा रहे हैं। तो फिर शिकवा-शिकायत कैसी... शुक्र मनाएं कि इतनी कमियों के बावजूद आप इस स्तर तक पहुंचने में सफल तो हुए। वरना अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाकर देखें कितने लोग ऐसे दिख जाएंगे जिनकी काबिलियत के आगे हमलोग कहीं नहीं टिकते, लेकिन फिर भी वे उस जगह को पाने के लिए आजतक तरस रहे हैं। आप तो खुशी मनाओ और अपनी तकदीर पर इतराओ कि औरों से आप बहुत आगे हैं। रही बात "परिभाषीय पत्रकारिता" करने की तो उसके लिए कई तरह के ऑपश्न मौजूद हैं। अखबार-पत्रिकाओं में आलेख लिखो...अपने संस्थान में ही कई मौके होंगे आपके लिए जहां आप कोई स्पेशल प्रोग्राम के लिए स्क्रिप्ट लिख सकते हैं, लिखने-पढ़ने के अवसरों से आप वंचित नहीं है। बस हिम्मत दिखाओ और स्यापा करना छोड़ दो।
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