Thursday, February 14, 2008

प्रेमी को प्रेमी मिला, सब विष अमृत होय

ईश्वर प्रदत सबसे सुंदर अनुभूति का नाम है प्यार। देखा जाए तो पूरी कायनात की बुनियाद प्रेम संबंधों पर ही टिकी है। अगर आदम और हव्वा के दिल में प्यार की टीस नहीं उठती तो शायद यह सृष्टि ही नहीं होती। तभी तो किसी कवि ने कहा है : -

"हर घर-आंगन रंगमंच हैऔर हर एक सांस कठपुतली।प्यार सिर्फ वह डोर कि जिस पर नाचे बादल, नाचे
तुम चाहे विश्वास न लाओ, लेकिन मैं तो यही कहूंगाप्यार न होता धरती पर तो सारा जग बंजारा होता।"

प्यार के बारे में कहते हैं कि यह एक अबूझी और अनूठी अनुभूति है जिसकी प्यास कभी न बुझती है, जिसकी रोशनी कभी धीमी नहीं पड़ती है। और अगर कबीर के शब्दों में कहें तो
प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा- प्रजा जेहि रुचै, शीश देय ले जाए।

प्यार को समझने-समझाने में न जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं, लेकिन फिर भी इश्क में डूबने-इतराने वाले आशिकों के लिए इस पहेली को भुना पाना आसान नहीं हुआ है। "दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजै, आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजै।"

रिश्तों की जमीन पर खिलने वाले हर फूल की खुशबू का नाम है प्यार। कबीर ने प्रेम की जो अलौकिक व्याख्या की है, वो इस तरह है-
प्रेमी ढूंढत मैं फिरौं, प्रेमी मिला न कोय।प्रेमी को प्रेमी मिला, सब विष अमृत होय।।

वहीं रसनिधि कहते हैं-अद्भुत गत यह प्रेम की, बैनन कही न जाइ।दरस भूख लागै दृगन, भूखहि देत भगाइ।।

आज का दिन दुनिया भर में प्रेम के उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। भारत में वैलेंटाइन डे मनाने का प्रचलन बहुत पुराना नहीं है, वैश्वीकरण की धारा में बाजार ने इस उत्सव को यहां के युवाओं में लोकप्रिय बनाया है। मगर प्रेम की गंगा यहां युगों-युगों से बह रही हैं। विश्व को दया, करुणा और शांति का पाठ पढ़ाने में भारत का अग्रणी स्थान है। प्रेम इन सभी गुणों के मूल में अंतर्निहित है। जो भी साधु-संत और समाजसुधारक हुए हैं सभी ने प्रेम का संदेश ही दिया

एक बात और गौर करने लायक है कि प्रेम का एक दिन ही क्यों हो... इसे तो जीवनशैली में बनाने की जरूरत है। प्यार के इजहार के लिए हम सिर्फ प्रेमिका के पास ही क्यों जाएं, हर नातेदार-रिश्तेदार, बूढ़े-जवान सबको प्रेम से गले लगाएं। प्रेम महज भावुकता नहीं, जीवनशैली है। हम भले ही अपने को आधुनिक मान रहे हों लेकिन इस अर्थ युग में समाज में प्रेम का अकाल पड़ा हुआ है।

अगर जीवन में प्रेम का नियमित संचार होने लगे तो इंसान के अंदर मौजूद सभी कमियां खत्म हो जाएंगी। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-धर्म की सारी दीवारें भरभरा कर गिर सकती हैं। लोग जीना सीख जाएंगे। हां मगर यह तभी होगा जब हम सिर्फ दिखावे के लिए प्रेमोत्सव के रंग में न रंगे, बल्कि डूबे उस नशा में जिसके प्याला में अगर जहर भी मिला दिया जाए तो वह अमृत बन जाता है।

2 comments:

Anonymous said...

Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the Teclado e Mouse, I hope you enjoy. The address is http://mouse-e-teclado.blogspot.com. A hug.

विजय कुमार झा said...

maja aa gaya dost. maine to bucharwa ke bad ye sab padha bhi nahin tha