Friday, December 21, 2007

गुजरा जमाना बचपन का

जगजीत सिंह की गाई हुई एक गजल है-

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो। भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी।।

हम जब किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे होते हैं, तब तो शायद बचपन उतना नहीं लुभाता, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ही बचपन की यादें बड़ी सुहावनी होती जाती है। आप ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, कई तरह की जिम्मेदारियां आपके कंधों पर आती जाती हैं, समय नहीं मिलता पलट कर देखने का। बस काम-काम और सिर्फ काम की धुन सवार होती है। ऑफिस में घर में पचास तरह के काम, कुछ जरूरी तो कुछ औपचारिक काम। कुछ निभाने को तो कुछ दिखाने के काम। इन सबसे जब कभी फुरसत मिले तो फिर फोन-फान, टीवी देखना, थोड़ा घूमना-फिरना, पढ़ना-लिखना, मित्रों से मिलना-जुलना सारा कुछ इन गतिविधियों के इर्द-गिर्द सिमटा रह जाता है। इतना सब कुछ के बाद नींद में सपने देखने की गुंजाइश भी कहां बची रहती है। अलबत्ता जब कभी बिल्कुल निश्चिंत होकर बिस्तर पर अनमना सा लेटा रहता हूं मोबाइल स्विच ऑफ कर तब मैं अक्सर फ्लैशबैक में चला जाता हूं। आज से 15-20 साल पहले के वक्त में। और बीते लम्हों को याद करते हुए जो खुशी मिलती है, उसे पाना अब मेरे वश में नहीं है। अब जितना कुछ मिल जाए, संतुष्टि नहीं मिलती। कुछ और पाने की चाह हमेशा बनी ही रहती है।

बचपन से सहेजी कुछ खट्टी-मीठी यादों को आज पहली बार कलमबद्ध करने जा रहा हूं। बचपन के बारे में जैसा मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है वैसा लिखना हर किसी के वश में तो नहीं, फिर भी लय, भाव और प्रवाह पर ज्यादा ध्यान न देते हुए मैं जीवन के उन अनमोल पलों को शब्दों में पिरोकर आपके सामने रख रहा हूं। पांच-भाई बहनों में मैं चौथे नंबर पर था। बचपन से ही कृशकाय। अव्वल दर्जे का शरारती। दिमाग से बिल्कुल सुन्न। जो जिद ठान ली, वह हर हाल में पूरी होनी चाहिए....नहीं तो जो कपड़े पहने होते थे, उसे तत्काल फट जाना था। डंडा लेकर बिजली के बल्बों को फोड़ देता था। घर में जो सामान करीने से रखे होते थे, दो मिनट के अंदर आंगन में बिखर जाते थे। अच्छा मेरे पापा को गुस्सा कभी नहीं आता, वह हम भाई-बहनों में से किसी को कभी एक थप्पर भी मारे होंगे यह याद नहीं। इतना ही नहीं वो हमें तुम से भी नहीं बुलाते...हमेशा आप ही कहते हैं। सबको मालूम था, इसे शांत करना है तो या तो इसकी जिद पूरी कर दो या फिर आफत झेलने को तैयार हो जाओ। मां कभी झल्लाकर मारने उठती भी तो दादी बचाव में आ जातीं और फिर बहला-फुसलाकर मुझे शांत कर देतीं।

बचपन में डॉक्टर- डॉक्टर खेलना सीखा। इसी दौरान मैंने मां के सामने फरमाइश रख दी कि मुझे असली वाली सूई-सिरींज चाहिए। मां ने मना किया तो रोना-धोना चालू। खाना भी नहीं खाया और एक घर में रखे संदूक के नीचे जाकर बैठ गया। दादी वहां से मुझे गोदी में उठाकर लाई और पिताजी को फरमान सुनाया कि किसी को भेजकर अभी सूई-सिरींज मंगवा दो। खैर साहब, पिताजी ने एक आदमी को साइकिल लेकर तत्काल बाजार भेजा और दो घंटे के अंदर मेरी फरमाइश पूरी हो गई।

असली करामात तो इसके बाद हुआ। मैंने आनन-फानन में सिरींज में पानी भरा, उस पर सूई लगाई और जो सज्जन बाजार से इसे खरीदकर आए थे चुपके से उन्हीं के कूल्हे पर जाकर ठोक दी। मारे दर्द के वो बिलबिला उठे। मैं फौरन दौड़कर दादी के पास पहुंच गया और खुशी-खुशी अपनी बहादुरी का किस्सा सुना आया। दादी बोली कि अब तो खैर नहीं। तेरे पापा तेरे साथ मुझे भी डांटेंगे। इसीलिए तुमने सूई मंगवायी है। चल ला इसे अभी तोड़ देती हूं। खैर उस दिन तो किसी तरह बच गया। लेकिन इसके एवज में जो कुछ मुझे झेलना पड़ा वो दास्तां कुछ इस प्रकार है। दो-चार दिन के बाद सबसे नजर बचाकर मैं दरवाजे पर आराम से लेटी कुतिया को सूई भोंकने पहुंच गया। ज्यों ही मैंने उसे सूई लगाई, काईं-काईं करते हुए पलटकर उसने मेरे बाएं पांव में दांत गड़ा दिए। मैं बाप-बापकर भागा आंगन की ओर। दरवाजे पर मौजूद नौकरों का ध्यान पड़ा। दौड़कर मुझे उठाया घर में कोहराम मच गया। मां-दादी, दीदी सब भागती हुईं आईं। मैं रोए जा रहा था...लेकिन सूई-सिरींज अब भी हाथ में ही थे, उसे मैंने नहीं छोड़ा था। पापा आए मेरे हाथ से सूई-सिरींज लेकर रख लिए और बड़ी आराम से बोले अब तो मन भर गया ना। ....

इसके बाद का एक और वाकया याद आ रहा है। तब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था।पिताजी ने एक शिक्षक को मुझे ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा था। बाकी एक अन्य शिक्षक थे ही, जो खासतौर पर अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ाते थे। शायद जून का महीना होगा। मैं बनियान पहनकर अपने गणित वाले शिक्षक से पढ़ रहा था। भाग का एक सवाल मैं लगातार गलत बना रहा था। तैश में आकर गुरुजी ने पीठ पर एक जोरदार मुक्का जड़ दिया। कुछ पल तो मैं चुप बैठा रहा, फिर चुपके से उठा और आंगन की ओर बढ़ गया। पांच मिनट के अंदर ही एक कमरे में रखी तलवार घसीटते हुए मैं दरवाजे की ओर दौड़ा। संयोग से मेरी मां की नजर पड़ गई। वो थोड़ी दूर में खड़ी थीं। चिल्लाते हुए वह मुझे पकड़ने के लिए दौड़ीं। फिर पापा को आवाज देते हुए बोलीं कि बौआ (मुझे घर में इसी नाम से बुलाया जाता है) तलवार लेकर जा रहा है, इसको पकड़ लीजिए। पापा लपककर मुझे पकड़ लिए बोले क्या हुआ, क्यों तलवार लेकर आ रहे हैं। मैं जोर से रोते हुए चिल्लाते हुए फट पड़ा- इस साले मास्टर की गरदन उतारकर रख दूंगा। मुझे मारता है...। मां पीछे से शिक्षक को आवाज लगाती हुई बोलीं कि वो भाग जाएं। मास्टर साहब ने हड़बड़ाकर साइकिल उठायी और भाग खड़े हुए। इसके बाद मुझे किसी तरह शांत किया गया।
तो ऐसा था मैं बचपन में। ऐसे ही कुछ और वाकये और फिर मैं कैसे एक शांत और समझदार किशोर बना, उसके बारे में आगे लिखूंगा।

5 comments:

Vandana said...

आपको देखकर नहीं लगता कि आप शरारती होंगे। लेकिन इस पूरे वाकया में मुझे आपकी दादी और बाबूजी की भूमिका बहुत अच्छी लगी। उन्होंने आपको बेहद समझदारी से बड़ा किया। अगर वो डांट-फटकार वाले होते तो आप शायद कुछ और ही होते। दूसरा आपके बचपन की यादें मेरी यादों की परत को भी उघाड़ गई हैं, जिनके बीच एक पल गुजारना भी एक अनोखे सुख की अनुभूति दिलाता है।
वंदना

विनीत उत्पल said...

jindgee jindadili ka nam hai.
Ghar ka bhed kholne main jute hai.
kya bat hai

विनीत उत्पल said...

jindgee jindadili ka nam hai.
Ghar ka bhed kholne main jute hai.
kya bat hai

Unknown said...


लक्ष्मी पुजे धन मिले , गुरू को पुजे ज्ञान !
माँ -बाप को पुजे सब मिले , हो जाए कल्याण !!

माँ वह रोशनी है
जो घर पर साथ रह कर
रास्ता दिखाती है !
पिता वह प्रकाश है
जो दुर रह कर भी
अनुशासन सिखाता है !!

Unknown said...

वाह, सुनील जी मजेदार किस्से और मधुर गुदगुदाने वाली यादें. यह स्मृतियां आपके लिए हमेशा खुश रहने की वजह देती रहेंगी. इन्हें संजोए रहिए और साझा भी करते रहिए. बचपन कभी लौटकर नहीं आता और जब चला जाता है तो बहुत याद आता है... वे दिन अनमोल हैं...