बुचुड़वा नाम है एक शख्स का, उसे दुनिया से गुजरे हुए हो गए होंगे करीब 14 साल। वह मेरे घर का नौकर था। हमारे यहां नीची कही जाने वाली जातियों के लिए ये भी तय रखा जाता था कि उनके बच्चों के नाम क्या रखे जाएंगे। कोई सुनील, अनिल, मोहन, सोहन, उनके घर पैदा नहीं हो सकता। उनके नाम वही होते, जिसका प्रयोग हिकारत भरे शब्दों के लिए हो सकता हो। जैसे छूतहरबा (मैथिली में छूतहर का मतलब होता है बदचलन), करिया (काला), बौका (गूंगा भले ही वो वाचाल ही क्यों न हो) आदि। हालांकि विगत 15 सालों में अपने गांव में ही मैंने किसी बच्चे का ऐसा कोई नाम नहीं सुना है। हालात अब काफी बदल चुके हैं। लेकिन बुचुड़वा जिस दौर में था, उस समय की स्थितियां अलग थीं। सामंती व्यवस्था किसे कहते हैं, उसका बहुत करीब से साक्षी रहा हूं।
पिताजी गांव के ही नहीं बल्कि जिले या कहें कि कमीश्नरी भर के कुछ चुनिंदा रसूखदार जमींदारों में गिने जाते हैं। गांव के लिए उन्होंने जितना कुछ किया है, वह बहुत से अमीरों के लिए एक सपना हो सकता है। गांव में प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक बनवाए हैं उन्होंने। बहुत सम्मानित और इज्जतदार गांव में उनकी गिनती निहायत ही शांत और ईमानदार शख्स के रूप में होती है। आज भी जिले भर के तमाम अफसर हमारे घर पर दावत में शरीक होते हैं। तमाम खूबियां हैं उनके अंदर। लेकिन जिस प्रसंग का मैं यहां जिक्र करने जा रहा हूं, वह एक दृष्टांत है कथित सामंतवाद के उस चेहरे का जहां शोषक और शोषित के संबंधों में मानवीय पहलू दबकर रह जाते हैं। वहां दया और करुणा सिर्फ और सिर्फ एक काल्पनिक सच्चाई भर बनकर रह जाती है।
मेरे दरवाजे पर दर्जन भर नौकरों की जो फौज थी, उसमें बुचुड़वा सबसे ईमानदार और कर्मठ माना जाता था। जाति से वह मुसहर था। किसी भी काम में भिड़ा दो बुचुड़वा जब तक उसे निबटा लेता तब तक दम मारने को भी नहीं बैठ सकता था। हां, खुराक वह तीन आदमियों के बराबर लेता था और दही-दूध, मांस-मछली का बड़ा प्रेमी था। मां के चहेते नौकरों में से था, क्योंकि घर के सब काम के अलावा बिस्तर, कंबल सुखाने और बाड़ी से साग-सब्जियां लाने का काम भी वह कर देता था। इसलिए मां उसके खाने-पीने में कोई कटौती नहीं होने देती। बुचुड़वा का पूरा परिवार मतलब उसकी बीवी, दो बेटे और दो बेटियां सब हमारे यहां खेतिहर मजदूर के तौर पर काम करते। हमारे दादा ने 50 से अधिक मुसहर परिवारों को जमीन देकर उनका घर बसाया था और वे सभी हमारे यहां मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। बाद में मैंने समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा कि इसे बंधुआ मजदूरी कहते हैं। तो बुचुड़वा का परिवार भी इन्हीं में से एक था। बुचुड़वा बड़ा ताकतवर था, क्योंकि क्विंटल भर अनाज की बोरियों को अपनी पीठ पर लादकर वह बड़ी आसानी से ट्रैक्टर-ट्राली से उठाकर गोदाम में रख देता। जून की तपती गर्मी में वह बांस के मोटे डंडे से डेंगाकर दिनभर में मूंग की फलियों से कई बोरियां दाने भर लेता। दिन भर काम करने के बाद वह रात को अपने घर सोने चला जाता।
जाड़े का मौसम था। एक रात हम सब भाई-बहन अपनी मां के साथ सो रहे थे। आधी रात के वक्त करीब बुचुड़वा दौड़ता हुआ और दरवाजे पर औंधे लेटे पहरेदार को उठाते हुए कहा कि पास वाले स्कूल में कई डकैत बैठे हुए हैं, मालिक (मेरे पिताजी को सभी मालिक कहते हैं) को जल्दी उठा दीजिए। फिर वह हमारे कमरे के पास खिड़की को जोर-जोर से पीटते हुए बोल रहा था, मालकिन जल्दी मालिक को उठाइए...स्कूल पर बहुत से डकैत बैठे हुए हैं। हम सब बच्चों की नींद खुल गई। तब तक पापा भी अपने कमरे से निकल आए थे। उन्होंने पूछा तो डर से थरथर कांपते बुचुड़वा ने कहा कि मालिक जल्दी बंदूक निकालकर छत पर चले जाइए डकैत सब इधर ही बढ़ रहा है। घर के सारे नौकर-पहरेदार भाला-फरसा, तीर-धनुष लेकर शोर मचाने लगे। पापा भी हमसब को साथ लेकर छत पर चढ़ गए। पड़ोस के लोग भी जाग गए थे। हमलोगों के तरफ से दनादन फायरिंग की जाने लगी। शायद डकैतों की हिम्मत नहीं हुई और वे भाग खड़े हो गए। सुबह जब स्कूल पर लोग पहुंचे तो वहां शराब की बोतलें आदि पड़ी हुई थीं। एक झोला भी मिला। बाद में पुलिस को भी सूचना दी गई। पापा-मम्मी, आस-पड़ोस और गांव के सारे लोग बुचुड़वा की वफादारी की चर्चा करते नहीं अघा रहे। लेकिन बुचुड़वा...उसे प्रशंसा से कहीं ज्यादा इस बात की खुशी मिल रह थी कि ईश्वर की कृपा से वह अपने धर्म से नहीं चूका। धर्म यही कि अन्नदाता पर आने वाली विपत्ति को वह टाल सका और ईश्वर की कृपा इसलिए कि अगर वह लघुशंका करने रात में अपनी झोपड़ी से बाहर नहीं निकलता तो उसे यह आभास ही नहीं होता कि सामने स्कूल में कुछ लोग बैठे हुए हैं और उनके कंधों पर हथियार लटक रहे हैं।
इस घटना को गुजरे हुए 20 साल से कम नहीं हुए होंगे। वक्त यूं ही गुजरता रहा और मालिक का वफादार बुचुड़वा अचानक एक दिन बीमार हो गया। उसकी पत्नी आई और बतायी कि जहरा का बाप यानी बुचुड़वा को बुखार हो गया है। तीन-चार दिन तक जब उसका बुखार न टूटा तो पिताजी को बुचुड़वा की कमी खलने लगी, कई काम दूसरे नौकरों से संभल ही नहीं पा रहा था। पिताजी ने बुचुड़वा की पत्नी को उसके इलाज के वास्ते कुछ पैसे दिए। गांव के झोलाछाप डॉक्टर ने सूई-दवाई दी मगर उसकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ। उसकी बीवी चार-पांच दिन बाद फिर पैसे मांगने आई...मगर पिताजी ने मना कर दिया, बोले कि अभी तो दिए ही हैं...कुछ खुद भी इंतजाम करो। दो-जून रोटी के लिए दिनभर मेहनत करने वाली उस औरत के पास पैसे कहां से आ सकते हैं, यह सोचनी वाली बात है। वह मां के पास जाकर रोने-बिलखने लगी...मां ने उसे चुपके से पैसे दे दिए। करीब 20 दिन गुजर गए, बुचुड़वा की तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ती ही रही। उस हालत में भी उसकी बीवी और उसके बेटे काम करने के लिए आते ही रहे। एक दिन मेरे ब्लॉक के डॉक्टर किसी काम से दरवाजे पर आए, तभी पिताजी को ख्याल आया कि बुचुड़वा को इनसे दिखला दिया जाए। उन्होंने तुरंत किसी आदमी को बुचुड़वा को रिक्शा पर लादकर लाने के लिए कह दिया। डॉक्टर ने बुचुड़वा के लिए कुछ टेस्ट तत्काल करवाने की हिदायत देते हुए दवाईयां लिख दीं और कहा कि टेस्ट की रिपोर्ट जरूर दिखा दें। डॉक्टरी जांच में पता चल गया कि उसे टीबी हो गई है। लेकिन अच्छे खानपान और नियमित इलाज से सुधार हो सकता है। मगर ऐसा हो नहीं सका और एक महीने के भीतर ही बुचुड़वा ने सदा-सदा के लिए आंखें मूंद ली। घर में किसी ने आकर बताया। मां की आंखों में आंसू भर गए और वे सुबकने लगीं हम भाई-बहन भी बड़ी उदास हो गए, मगर पापा.... आंगन में आकर बोले अरे टीबी हो गया था उसे, बचने की संभावना ही कहां थी उसकी। बुचुड़वा के इलाज और श्राद्ध में जो पैसे खर्च हुए वो पिताजी ने ही दिए थे और इसके एवज में उसका बेटा साल भर हमारे यहां काम करके कर्जा चुकाता रहा और अपने बाप की वफादारी उसकी मौत के बाद भी निभाता रहा। (यह सौ फीसदी सच्ची कहानी है, मगर कालक्रम पुराना है। स्थितियां अब बिल्कुल बदल चुकी हैं और कथित सामंतवाद का चेहरा अब काफी धुंधला हो चुका है।)
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8 comments:
kahani dil ko bahut bhayi hai. prashansha ke liye hum jaise tipne wale tathakathit patrakar ke pas shabda nahin hain. kintu vadhai ke shabda to hain hi. jaisa aapne blog ka nam rakha hai. usi hisab se aapne nirbhikta se likha bhi hai. keep it up young and energetic journalist.
Etana khara khara likhiyga !!!!!!
प्रियवर, जिस माहौल में मैं पला-बढ़ा और बचपन से ही जैसी सोच मेरी रही है उसमें हमेशा से एक द्वंद्व सा रहा है...बड़ों की इज्जत करना मैं खूब अच्छी तरह जानता हूं, लेकिन जो कुछ मैंने देखा है...उसके प्रति एक क्षोभ आजतक मन में बना हुआ है। बस वही उगल रहा हूं...वैसे अपने घर में भी मेरी छवि विद्रोही की ही रही है, लेकिन आप जानते ही हैं मैं ऐसा हूं नहीं
Is poori katha mein ek hi baat tasalli dene wali hai... Sthitiyaan ab poori tarah badal chuki hain... Varna main tumhe iska virodh, aur zaroorat pade to vidroh karne ki bhi salaah deta...
Likha achchha hai, kyonki dil mein rakhi huyee baat keh rahe the... Bhasha par ab bhi kuchh-ek jagah dhyaan dene ki zaroorat hai, kyonki kuchh jagah woh Hindi se Hindustani (Bolne wali Hindi) ho gayee hai...
Keep up the good work. Merry Christmas!
suni babbu, bahut hi achcha laga ki aap ke andar bhi chhobh hai. Kahani ekdam dil ko chhoo gayi. himmat kabile taarif hai.
all the best
You rock babu!!
mindblowing story
Its so touchy, so painful!!
Sunil ji, gaaon mein rahne ka aapke jitna anubhav to nahin hai par jitana bhi hai wo sab aapki kahani padhkar ek baar fir aankhon ke saamne aa gaya. Kahani sachmuch dil ko chhoone wali hai.
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