Monday, December 10, 2007

अब तो बदल जाओ...

आईआईएमसी के हिन्दी पत्रकारिता पाठ्यक्रम में मेरे जितने भी साथी थे, उनमें से अधिकतर बिहार और उत्तर प्रदेश से थे। इनमें से भी अधिकांश वैसे थे जो पत्रकारिता के क्षेत्र में इसलिए आ रहे थे या कहें कि घुस रहे थे क्योंकि सरकारी नौकरियों में प्रवेश के अवसर सीमित हो गए थे। कुछ सिविल सविर्सेज की तैयारी में जुटे थे और पत्रकारिता के रूप में एक ऑप्शन बनाए रखना चाहते थे कि अगर हाकिम नहीं बन पाया तो कम से कम पत्रकार तो बन ही ए चार-पांच लोग थे जो सचमुच लिखत-पढ़त में शौक रखते थे और पत्रकारिता को कैरियर की दृष्टि से अपनाने आए थे। मेरे जैसे दो-चार जने ऐसे भी थे जो सिर्फ नौकरी पाने के लिए इधर खिसक आए थे। अब आते हैं असली बात पर। जो कुछ मैं यहां लिखने जा रहा हूं, उसे मैं कभी भी अपने उन सम्माननीय मित्रों के सामने कहने की हिम्मत नहीं कर सकता हूं, क्योंकि उनकी जो आभा है उसकी चमक से मेरी आंखें चौंधिया जाती हैं, जुबान लड़खड़ाने लगती है और मैं कुछ बोल नहीं पाता हूं। दब्बू स्वभाव का जो ठहरा। उनके अंदर जो खासियतें और खामियां हैं उनसे नौ महीने के पत्रकारिता प्रशिक्षण सत्र के दौरान अच्छी तरह से वाकिफ हो चुका था। बढ़ चढ़कर बोलना, किसी भी सवाल के जवाब में नया सवाल दाग देना, दूसरों पर हावी होने के लिए मौका मिलते ही उसकी खिंचाई कर देना... इन तमाम फनों में वो माहिर हो रहे थे। शायद एक सफल पत्रकार बनने के लिए ये आवश्यक गुण हैं? तमाम साथियों के लिए अलग-अलग उपनाम विकसित कर अपना शब्दकोश भी समृद्ध कर लिया। संस्थान में आकर पढ़ाई करना उनके लिए जरूरी नहीं था, क्योंकि वे तो जन्मजात पत्रकार थे और हमारे जैसे जो चुपचाप और थोड़ा सहमे से रहने वाले छात्र थे उनके सामने अपनी विद्वता का बखान करने से कभी नहीं चूकते थे। हमें लगता था कि प्रशिक्षण के बाद जब नौकरी ढूंढ़ने का वक्त आएगा तो हम तो इन लोगों मुकाबले कहीं टिक ही नहीं पाएंगे। कितना आत्मविश्वास से भरे होते थे हमारे वे सारे सम्माननीय मित्र। वे कभी प्यार से आकर अगर हमसे बातें भी कर लेते थे तो हम कृत्य-कृत्य हो जाते थे, वरना हम अपने दो-चार दोस्तों के दायरे में ही सिमटे रहते। मैं तो बस इतनी आस पाले बैठा था कि अप्रैल में जैसे ही कोर्स खत्म हो, मुझे कहीं नौकरी मिल जाए 4 हजार तक की। मेरे दोस्तों में से कुछ एक-दो अध्यापकों के केबिन के खास मेहमान जैसे थे, अक्सर वहां बैठकर जुगाड़ तलाशने की जुगत भिड़ाते रहते थे। फिर ऐसा हुआ कि इंटर्नशिप से पहले-पहले ही एक प्रतिष्ठित अखबार में ट्रेनी जर्नलिस्टों के लिए भर्ती का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। सारे छात्र उसमें शामिल हुआ, लेकिन जब उक्त अखबार के दफ्तर से सूचना प्राप्त हुई तो हमारे शेखीबाज दोस्तों की हवा निकल गई। वहां चार छात्र चयनित हुए और इसमें कोई दो राय नहीं थी कि वे चारों के चारों बकायदा अपनी मेधा और काबलियत साबित करके ही इसमें सफलता हासिल कर सके। हमारे हवाबाज दोस्तों के दंभ में कुछ कमी आई और अब इन चारों की पूछ बढ़ गई। जो चार लड़के चयनित हुए उनमें से तो एक को संस्थान में मेरे जैसे दो-चार लड़कों के अलावा कोई पूछता नहीं था, हमारे जन्मजात पत्रकार लोग तो खासकर नहीं। लेकिन इस सफलता ने उसके प्रति उन बुद्धिजीवियों की सोच में थोड़ा फर्क तो जरूर ला दिया। खैर साहब सब के सब जुटे रहे। कुछ जो ज्यादा चतुर-सुजान थे उन्होंने एक टीवी चैनल में नौकरी हासिल कर ली और मेहनत करते हुए आज अच्छे ओहदों तक पहुंच गए हैं। कुछ जिनके पास सिवाय मीडिया हाउसों के दफ्तरों के चक्कर काटने के और कोई चारा नहीं था, उनमें से अधिकतर ने बाद में नौकरी तो हासिल कर ली, लेकिन कोई तीसमारखां वाली स्थिति उनकी अभी नहीं बन पाई है। प्रिंट से शुरुआत करके एक मित्र टीवी माध्यम का रुख कर लिए और वहां जाकर धड़ाधड़ तीन-चार नौकरियां बदलकर आज बहुत अच्छी पोजिशन में हैं। वहीं एक मित्र ने समाचार एजेंसी से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का सफर करीब तीन साल में तय करने के बाद साल भर में ही व्यथित, दुखित और आहत होकर वहां से विदा होने का मन बना लिया है। मित्रों में मित्र कहे जा सकते हैं हमारे एक साथी, जिन्होंने अपनी शारीरिक अपंगता के बावजूद संघर्ष करते हुए सफलता हासिल की। उनकी जिंदादिली के कायल हमारे बैच के सभी साथी हैं। अब बात हमारे कुछ ऐसे साथियों की जो कभी उस मंडली के सक्रिय सदस्य होते थे, जिन्हें जन्मजात पत्रकार होने का गर्व था, लेकिन कामयाबी के मामले में थोड़ा पीछे रह गए हैं (वैसे हम जैसों से तो आगे ही होंगे)। अब उनका दर्प, उनका बड़बोलापन सब फुर्र हो चुका ...वैसे भैया हम तो आपको हमेशा से सम्मान की नजरों से देखते रहे हैं तो आपको शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। दिन का फेर है सब...आपने गुजरे दिनों में जितना हांका, उतना नहीं पा सके या दिखा सके तो इसमें कोई बुराई नहीं, मगर हां हांकने की फितरत कम से कम अब तो बदल लो.... (ये आलेख अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन आज फिलहाल इतना ही।)

4 comments:

Vikas Gaur said...

I liked it a lot coz I could connect the events and charaters up to some extent. Clearly and simply expressed views .....AAPBEETI rather. I hope and expect that it doesn't stop here.........GUD LUCK.

Unknown said...

आपकी इस पेशकश पर आपकी ही शान में कुछ अर्ज़ है
हमको खामोश ही रहने दो यही है बेहतर
लब हिलेंगे तो उतर जायेंगे चेहरे कितने

विनीत उत्पल said...

kya bat hai prabhat jee, sansthan se dur bersari ke dilpat pawar ke lodge ke kamra no.28 ke main bhee bashinda raha tha aur bas saree yaden film ke bhantee suniljee na sabdon me piro dee.

विजय कुमार झा said...

bap re bap! itna gussa. khair aap ani bhadas to nikale. bhai we log yadi aisa nahin karte to abhi jo kuchh bhi hai. wah bhi nahin rahte. hamen khushi honi chahiye ki sabhi ko jaise taise nokri mil gayee.